
मदर्स डे-डॉ. सरस्वती माथुर
कहानी
डॉ. सरस्वती माथुर
मदर्स डे
कल मदर्स डे है। यह दिन प्रसादी देवी को एक अजीब सी बेचैनी से जकड़ लेता है। वह अपनी खोजती निगाहों से इधर-उधर देखने लगती हैं। उन्हें बच्चे व अपना परिवार याद आ जाता है। मन की खाली दीवारों पर अतीत की असंख्य तस्वीरें उभर कर उनके वजूद पर प्रहार करने लगती हैं। उन्हें लगता है कि कोई पाखी अपना घरोंदा भूल गया है और उसे ढूंढता हुआ एक डाल से दूसरे डाल पर घूमते हुए गहरी पीड़ा से कराह रहा है, यह पीड़ा प्रसादी देवी के मन की दीवारों पर खरोंचें लगाती हवा में तैरने लगती हैं, प्रसादी देवी की आंखों से दो बूंदें लुढ़क जाती हैं।
हर साल यह दिन उन्हें ऐसी ही टीसें देता है। मदर्स डे की सुबह और सभी दिनों से अलग होती है जो उन्हें उदासियों के घेरे में घेरे रखती हैं। प्रसादी देवी ने सिर झाटक कर अपनी भावनाओं को काबू में किया ताकि वह आश्रम के सारे कार्य सुचारू रूप से कर सके। वह वर्तमान में लौटीं।
दरअसल ब्रह्मआश्रम में आज उत्सव का सा माहौल था। एक फिल्म मेकर वहां के कुछ शॉट्स ले रहा था, प्रसादी देवी रसोई की चौखट पर अपनी साथिनों के साथ बैठी सब्जियां काट रही थी। वे रसोईघर की मुखिया थीं। माधुरी बहन जो वृद्धाश्रम को संचालित करती थीं वे भी इधर से उधर घूम रही थी। तभी एक प्रोड्यूसर टीम से जुड़ी लड़की वहां आई और प्रसादी देवी के पास पालथी मार कर बैठ गई, उनसे माइक आगे कर प्रश्न पूछने लगी -'अम्मां जी आपका नाम क्या है? और आप कब से यहां हैं?'
'कई साल हो गए, तुम्हारी उम्र क्या है?'
'अम्मां जी ,मैं रमोला हूं, बाइस साल की हूं।' लड़की ने शालीनता से जवाब दिया ।"
'मंै चौबीस साल से यहां रह रही हूं।'
'घरवाले मिलने आते हैं अम्मां जी?'
'नहीं, कई साल हो गए उन्हें देखा नहीं है मैंने। शायद वे भूल गए हैं या सोचते होंगे कि मैं मर गई हूं, मेरी याद्दाश्त भी कमजोर हो गई है बेटी। बहुत सी बातें याद नहीं आती।' प्रसादी देवी ने रुंधे कंठ से कहा तो लड़की की आंखें भी भर आईं। आंसू रोक कर लड़की ने पूछा-'आपको यहां पर कौन छोड़ गया था?'
'बेटी, यह लंबी कहानी है,ज्यादा तो नहीं बता पाऊंगी पर हां यह कभी नहीं भूली कि उस दिन अंग्रेजी तारीख के हिसाब से मेरा जन्मदिन था। यह दिन मेरे परिवार वाले उत्साह से मनाते थे। उस दिन मेरे पति स्कूटर पर मेरे लिए केक लेकर लौट रहे थे कि एक ट्रक ने टक्कर मार दी। वे इस दुर्घटना में मौके पर ही चल बसे। सदमे से मैं पागल हो गई थी। मुझो दौरे पडऩे लगे थे। जब घर में कंट्रोल करना मुश्किल हो गया तो घरवालों ने मेंटल अस्पताल में भर्ती करवा दिया। वह बराबर सम्पर्क में थे। ठीक होने में कई वर्ष लग गए, ऐसा बताया गया मुझो। जब अपने काम अपने आप करने लगी व दौरे पडऩे बंद हो गए तो अस्पताल वालों ने घर पर खबर की पर काफी इंतजार के बाद भी वहां से कोई नहीं आया। धुंधला सा याद है कि अस्पताल के लोग हमारे घर भी गए थे तो वहां जाकर पता चला कि परिवार घर बेच कर दूसरे शहर में चला गया है। आसपास वालों को भी पता नहीं चला। बस बेटी, तब से अस्पताल वालों की केयर टीम ने मुझो यहां भेज दिया। अब यही मेरा घर है। आज भी जब मेरा जन्मदिन आता है तो मेरा मन उदास हो जाता है।' कह कर प्रसादी देवी की आंखों से झारने की तरह आंसू बहने लगे। लड़की कुछ क्षणों तक उनके कंधों पर हाथ रखे नीची गर्दन किए बैठी रही। फिर उनके और करीब सरक कर लड़की ने धीरे से पूछा- 'आपके कितने बच्चे थे अम्मां जी?'
'भरा पूरा परिवार था बेटी, नजर लग गई,कोई कमी नहीं थी, भगवान का दिया सब कुछ था। हमारे एक बेटा था और एक बेटी थी। कुछ दिन पहले ही दोनों की शादी धूमधाम से की थी मैंने, शादी के बाद बेटी तो विदेश चली गई थी, सुना था अस्पताल में वो बराबर पैसे भी भेजती रही,अब कौन कहां हैं मालूम नहीं मुझो। हां कुछ -कुछ बातें याद है। बेटे-बेटी की शक्लें तक भी अब तो कभी-कभी धुंधलाने लगती हैं। वैसे भी सारी जिंदगी निकल गई। पुरानी बातें सपना सी लगती हैं। हां मदर्स डे आता है तो बच्चे याद आ जाते हैं। यहां सबके बच्चे मिलने आते हैं, बस मैं ही अभागिन हूं, जाने मेरे बच्चे कहां हैं? मेरा जाने क्या कसूर था कि मेरे बच्चे मुझो भूल गए। बस बेटी अब कुछ मत पूछना, चक्कर आने लगे हैं मुझो।'
' हां ठीक है अम्मां जी, बस एक आखरी सवाल करती हूं वो भी जवाब के साथ -'क्या आपके बेटे का नाम दयाशंकर था?' लड़की ने भरे गले से पूछा।
'हां मुनिया, तुझो कैसे मालूम, तू जानती है क्या मेरे दया को?' प्रसादी देवी की आवाज और हाथ कांपने लगे। रमोला ने कस कर होंठ भींच कर रूलाई रोकी, फिर अपने को संयत कर बोली-'अम्मां जी, यह मेरा आखरी इंटरव्यू है। मैं अब तक पूरे शहर के वृद्धाश्रम, समाज कल्याण विभाग से जुड़ी संस्थाओं में फिल्ममेकर की हैसियत से जा रही हूं, मालूम है अम्मां जी क्यों? आप को ढूंढने। अब आप मेरी कहानी सुनें-मेरे पिताजी हैं दयाशंकर, आपके दया-जानती हैं बदकिस्मती से एक दिन अचानक उनको पार्किंसन्स बीमारी हो गई। फिर दोनों पैरों में लकवा मार गया और उन्होंने पलंग पकड़ लिया। मेरी मां ने हम सभी का दायित्व संभाला, हमें बड़ा किया, बचपन से मैं देखती रही हूं, मेरे माता पिता की आंखों में गहरा दर्द है,आपको ढूंढऩे का। आप शायद यकीन नहीं करें आज तक अस्पताल की बेरूखी व लापरवाही का मुआवजा भुगत रहे हैं हम लोग! अम्मां जी जिस अस्पताल में आप भर्ती थीं उसके हम बराबर टच में रहे पर एक दिन मालूम पड़ा कि किसी और डॉक्टर ने वह अस्पताल खरीद लिया है और वहां नए डॉक्टर व नया स्टाफ आ गया है, जाने कब वहां के रिकॉर्ड बदल गए। पुराने रिकॉर्ड नष्ट कर दिए गए, क्यों और कब कोई नहीं जानता। पंद्रह दिनों के अंदर सारा सिनारियो बदल गया। आपको इस बीच कहां शिफ्ट किया यह तक पता नहीं चल पाया, जहां बताया वहां की संस्था के कई चक्कर काटे, उन्होनें सारे रिकॉर्ड आगे कर दिए, आपका नाम नहीं था। मानव अधिकार विभाग में पत्र भी लिखा। इस बीच पापा को मुम्बई के अस्पताल में दिखाने के लिए शहर से तबादला लेना पड़ा था। इस दौरान सारा घटनाक्रम बदल गया।
एक दिन अचानक पापा के एक बचपन के दोस्त जब टी.वी. देख रहे थे तो उन्होंने देखा कि एक वृद्धाश्रम में कोई कार्यक्रम चल रहा, वहीं उन्होंने एक झालक आपकी देखी पर उन्हें याद नहीं आया कि किस चैनल पर कार्यक्रम चल रहा था, बस दिल्ली शहर है यह अंदाजा रहा। फिर भी कई चैनलों के दफ्तरों में बात की पर पुख्ता जानकारी नहीं मिल सकी। अम्मां जी तभी से मैं इस काम में जुट गई, एक पुण्य का काम भी लगा मुझो। -अम्मां जी आज हमने क्या पाया है आपको कैसे बताऊं, मेरे लिए तो आज का दिन खुशियों की सौगात लाया है, हर समय आप हैं भी या नहीं बराबर यह आशंका परिवार में बनी रही,अस्पताल पर केस भी किया, पर कुछ नहीं हुआ, पापा निष्क्रिय हो गए थे इसलिए बड़ी होने पर यह बीड़ा मैंने उठाया। देखो, आज आपको खोज लिया ना? अम्मां जी, कैसे बताऊं हम कितना रोए हैं आपके लिए, मैं तो तस्वीरों से ही आपको जानती थी, जिसे पापा टुकुर -टुकुर देखते रहते थे। कितना प्यार करते हैं हम सभी आपको अम्मां जी,आप नहीं जानती हैं ...।' एक लंबी कहानी की तरह सब कुछ कह कर रमोला प्रसादी देवी की पोती उनके गले से लिपट कर फूट -फूट कर रो रही थी।
आश्रम की संचालिका माधुरी बहन, सदस्यगण व सारे कर्मचारी भी वहां आ गए थे। वो कैसी जुदाई थी, यह कैसा मिलन था सोच कर सभी रो रहे थे। प्रसादी देवी तो पत्थर की तरह जड़वत थीं। क्या यह सपना है?
अब वृद्धाश्रम का नजारा दूसरा ही था। सभी ख़ुश थे। प्रसादी देवी का परिवार मिल गया था। लड़की ने मोबाइल से उनकी बात घरवालों से करवा दी थी, बात तो कोई भी नहीं कर पा रहा था, बस सब रो रहे थे। प्रसादी देवी ने प्यार से रमोला को देखा-अरे उसकी शक्ल तो बिलकुल अपने दादा जी जैसी है। उन्होंने दोनों हाथ फैला दिए। हाथों के घेरे में समा रमोला भाव -विभोर हो गई और प्रसादी देवी अतीत में कहीं खो गई। आश्रम में एक उत्सव का सा बड़ा उल्लासित करने वाला नजारा था। पर जाने क्यों प्रसादी देवी की आंखों में एक चमक के साथ दर्द भी था। उनका परिवार उन्हें भूला नहीं, ढूंढ रहा था। सोच कर उन्हें अपने दिए संस्कारों पर गर्व हो रहा था। पर फिर भी प्रसादी देवी के मन का एक कोना खाली -खाली व उदास लग रहा था। कैसे भूल सकेंगी वो कि माधुरी बहन के इस ब्रह्म आश्रम में उन्हें एक नया जीवन मिला था,कुछ आत्मीय दोस्त मिले थे और सबसे बड़ी बात अपनापन मिला था। जीवन भी क्या-क्या रंग दिखाता है ।
अपने परिवार से मिलने की बेचैनी उनकी आंखों में स्पष्ट दिख रही थी। यह मदर्स डे हमेशा याद रहेगा। वह नई कलफ लगी साड़ी जो उन्हें माधुरी जी ने कभी भेंट की थी पहन कर बहुत लगन से तैयार हुई। आज उन्होंने बरसों बाद आईना देखा था। वे सोच रही थीं क्या उनका बबुआ दया व बहू कमला उन्हें पहचान पाएंगे? वह तो अब सफेद बालों वाली लंगड़ा कर चलने वाली एक बुढिय़ा है। क्या वे बबुआ को पहचान लेंगी। वह जवान दया अब कैसा लगता होगा-नि:शब्द रह कर वह बस अपने आप से बराबर बोल रही थीं।
एक फिल्म की तरह प्रसादी देवी की आंखों के सामने से पूरा जीवन गुजर गया था -क्या भूलूं क्या याद करूं सी ऊहापोह की स्थिति भी थी। पति की बार -बार याद आ रही थी। आज प्रसादी देवी का यह जन्मदिन अनूठा उपहार लेकर आया था। कैसा इत्तफाक था कि आज मदर्स डे भी था! माधुरी बहन व पोती रमोला ने मिल कर प्रसादी देवी का सारा सामान जमा कर बाहर बरामदे में रख दिया था।
प्रसादी देवी ने वृद्धाश्रम परिसर के मंदिर में जाकर दिया जलाया। चारों तरफ नजरें घुमा कर पूरे आश्रम को भीगी आंखों से देखा और तभी मन -ही -मन एक निर्णय ले लिया ।
बाहर कार तैयार खड़ी थी। रमोला ने प्रसादी देवी को सूचना दी कि घर में सारे दूर दराज के रिश्तेदार आपकी बाट जोह रहे हैं। घर में पूजा चल रही है। आपके आने की खुशी में खीर पूड़ी बन रही है।
'जल्दी चलों अम्मां जी उनसे इंतजार नहीं हो रहा अब।'
'जानती हूं बचुवा जी पर मेरी भी एक शर्त है।' प्रसादी देवी ने पोती के कंधे पर हाथ रख कर कहा तो सब चौंक गए।
'हां कहो ना अम्मां जी, आपकी हर शर्त सर आंखों पर।' पोती ने गद्गद् स्वर में कहा।
माधुरी बहन ने भी प्रसादी देवी के कंधे पर हाथ रख कर अपनी मौन सहमति दी। उनकी हर शर्त मान्य होगी। आंखों से यह संकेत भी दिया।
'मैं जरूर तुम्हारे संग घर चलूंगी और अपना सारा समय भी वहां तुम लोगों के साथ बिताऊंगी, मैं बहुत ख़ुश हूं कि तुम लोग मुझो भूले नहीं और आखिर में मुझो ढूंढ निकाला। मैं रोती भी रही थी यह सोच कर कि मुझो लेने क्यों नहीं आ रहे हैं घरवाले?' प्रसादी देवी ने रूंधे गले से कहा तो पूरे कमरे में एक सन्नाटा पसर गया। टेबल पर रखें गिलास से पानी का एक घूंट पीकर वह फिर आगे बोली-
'बेटा, तुम्हारे साथ मैं घर चलूंगी पर मैं वहां ज्यादा दिन रहूंगी नहीं, वापस यहीं लौट आऊंगी।। अब यही मेरा घर है। मेरी विदाई भी यहीं से होगी। हां, हम मिलते रहेंगें। सारे त्योहार साथ करेंगें, मेरा जन्मदिन तो हमेशा साथ ही मनाएंगे। हम एक ही शहर में हैं एक ही परिवार हैं, पर अब मेरा मन तो यहीं इस ब्रह्म आश्रम के परिसर में रमेगा। क्यों माधुरी बहन सही कह रही हूं ना मैं?' प्रसादी देवी ने आंखें झापका कर सहमति मांगी। माधुरी बहन होंठ दबा कर अपनी रूलाई रोक रही थी। प्रसादी देवी की सभी आश्रम की संगिनियां उनके इर्द -गिर्द आ खड़ी हई थीं। शायद ही कोई ऐसा जन होगा जो मन -ही -मन नहीं रो रहा होगा। स्नेह की कलकल नदी वहां बह रही थी। जिसे देख पोती ने भी भरी आंखों से मौन सहमति दी। उसने अपनी दादी को ढूंढ कर यह साबित कर दिया था कि परिवार आत्मा का बंधन होता है उसकी लौ में ही हम संस्कारित व परिष्कृत होते हैं। प्रसादी देवी को सभी ने मिल कर टैक्सी में बिठाया। टैक्सी चल पड़ी। सभी संगी-साथी और माधुरी बहन तब तक आश्रम के परिसर की देहरी पर खड़े रहे जब तक की टैक्सी आंखों से ओझाल नहीं हो गई।'

Published on:
06 Jun 2018 01:24 pm
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