
कहानी-दर्द के साए-अवधेश श्रीवास्तव
कहानी
अवधेश श्रीवास्तव
दर्द के साए
सु बह के सात बज चुके थे, तेज रफ्तार से भागने वाली लखनऊ एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर रेंगने लगी थी। स्टेशन अपने नवाबीपन की अजीब छटा बिखेर रहा था। सूटकेस और हैंडबैग लेकर मैं स्टेशन से बाहर आ गया।
'बाबूजी कहां चलिएगा?'
मुड़कर देखा तो रिक्शा वाला था। मैंने बोला - 'आलम बाग चलना है।'
'आइए।'
'कितने रुपए लोगे?'
'दस रुपए।'
'यह तो ज्यादा हैं।'
'ज्यादा हैं, तो आठ ही दे दीजिएगा।'
उसके स्वर में विनम्रता होने की वजह से मैं चुपचाप रिक्शे पर बैठ गया। लखनऊ की चौड़ी सड़कों एक सूनापन-सा व्याप्त था। सड़क के किनारे की दुकानें अपने दरवाजों पर ताला लगाए थीं। फुटपाथ के ऊपर इक्का-दुक्का लोग ही दिख रहे थे। कुछ नहीं सूझाा तो मैंने सोचा, चलो, रिक्शे वाले से ही बातें की जाएं। खामोशी तोड़ते हुए रिक्शे वाले से पूछा 'तुम कितने वर्षों से रिक्शा चला रहे हो?'
'पांच वर्षों से'- वह अन्यमनस्क भाव से बोला।
'सिर्फ पांच वर्षों से?' मैंने चकित होकर पूछा-'तुम्हारी उम्र कितनी है? तुम इससे पहले क्या करते थे?'
'क्या करेंगे किसी गरीब की जिंदगी के बारे में जानकर?...आप पहली सवारी है मेरे बारे में जानना चाह रहे हैं।' उसने बगैर पीछे देखे इतनी बात कही और खामोश हो गया। मुझो अपने में खोई इस दुनिया पर बेहद गुस्सा आया। आखिर मेरे बार-बार कुछ न कुछ पूछने पर वह बोला- 'मेरी उम्र तैंतीस वर्ष है। मैंने अपनी सत्रह वर्ष से अ_ाइस वर्ष तक की उम्र जेल में काटी है।'
'जेल में!' सहसा मैं आश्चर्य में डूब गया।
'हां! जेल में!' उसकी आवाज में कठोरता आती चली गई।
'किस वजह से?'
'मैंने अपने गांव के जमींदार के लड़के का खून कर दिया था।'
'खून।'
'हां! खून!!'
'आखिर क्यों?' मैं उत्सुकता से भर उठा।
'मेरी एक बहन थी।'
'क्या वह मर गई?'
'नहीं, अभी जिंदा है, पर मेरे लिए मरे के समान...' उसका गला रुंध गया था। वह कुछ देर के लिए खामोश हो गया।
मुझो लगा जैसे मैं किसी क्रिमिनल फिल्म की स्टोरी में डूब गया हूं। मेरे कुरेदने पर वह बोला -'बनारस शहर से दस मील दूर मेरा गांव है। मेरे परिवार में पांच लोग थे। एक भाई मुझासे बड़ा एक बहन मुझासे छोटी, दुखी मां और मेरा शराबी बाप।'
'शराबी बाप।..'
'हां, मेरा बाप शराबी था। शराब की लत में उन्होंने टूटा-फूटा मकान भी गांव के जमींदार को गिरवी रख दिया था।'
'तुम्हारे परिवार का खर्चा कैसे चलता था?'
'बाप जितनी मजदूरी कमाता। उतनी सब शराब में गंवा देता था। मेरी मां दूसरों के बर्तन मांजती, झााड़ू लगाती, कपड़े धोती। बस, इसी तरह से हम सबका खाने का इंतजाम करती और खुद कुछ भी बिना खाए मेरे शराबी बाप का इंतजार करती लेकिन जब भी वह लडख़ड़ाते कदमों में आता तो सबसे पहला काम करता, मेरी मां को बेरहमी से पीटता।'
'तुम्हारी मां का कोई कसूर होता था।'
'मां का सबसे बड़ा कसूर यह था कि वह एक औरत थी।'
'फिर क्या हुआ?' मैंने बात आगे बढ़ाई।
'रूखी-सूखी, बासी खाकर हम तीनों भाई-बहन बड़े होने लगे, पर रामू जब बीस वर्ष का था, तब...'
'रामू कौन ...?'
'रामू, मेरा बड़ा भाई था।'
'क्या हुआ था उसे?'
'गांव के साहूकार के यहां चोरी हो गई।'
'तो?'
'इस चोरी में रामू का नाम आ गया। पुलिस के डर से वह भाग गया। पुलिसवालों ने हमारे घर जाकर, मेरी मां को मारा, बाप को मारा, पर सच में हम किसी को मालूम नहीं था कि रामू कहां भाग गया।'
'फिर वह कब लौटकर आया?'
'कभी नहीं!'
'कभी नहीं!'
'हां, वह कभी भी लौटकर नहीं आया। पता नहीं कि वह जिंदा भी है या मर गया। कुछ लोग कहते थे कि वह मुंबई भाग गया है।'
'तुम्हारा रामू भाई भागा था, तब तुम क्या करते थे?'
'आठवीं कक्षा में पढ़ता था।'
'पढ़ते थे?'
'मां मुझो पढऩे का खर्चा देती थी। आठवीं पास करके मैं बनारस चला आया। गांव के लड़कों की किताबें लेकर भी पढ़ता था और कुछ मां जो खर्चा देती थी उससे भी पढऩे-लिखने व खाने-पहनने का इंतजाम करता था।'
'फिर....'
'एक दिन मां की खबर आई कि वह बीमार है। पैसे न होने के कारण पैदल ही घर चल दिया। रास्ते-भर सोचता रहा, हाई स्कूल पास करके कहीं नौकरी कर लूंगा। मां जिसके तन पर सारी उम्र चिथड़े लिपटे देखे हैं, अच्छे कपड़े बनवा दूंगा। बहन की शादी ऐसे घर में कर दूंगा जहाँ कम-से-कम उसे रोटी, कपड़ा आदि की परेशानी न हो, पर सोचा कब पूरा होता है...।''
उसके खामोश हो जाने पर मेरे मन में अजीब-सी छटपटाहट होने लगी। अब साहस करके पूछा-'आगे क्या हुआ?'
'मां बहुत बीमार थी। वह मेरे गले से चिपटकर रोई। उस रात मैं चुपचाप लेटा था। अचानक मां मेरी खाट पर आकर बैठ गई और बोली- 'अब तू कहीं नौकरी कर ले और बहन के हाथ पीले कर दे। पराया धन है अपने घर जाए। मैंने पास ही के गांव में तेरे लिए भी रिश्ता देखा है। तेरा भाई तो भाग ही गया है अब तू ही मेरी आशा पूरी कर दे।'
'क्या तुम्हारी शादी हुई?' मैंने बीच ही में उसे टोक दिया।
'नहीं।'
'क्यों?'
अगली सुबह मैं टहलने निकला, तो एक झााड़ी की ओट में मुझो रोने की आवाज सुनाई दी। मैं उधर ही चला गया। सिसकियां भरी आवाजें सुनकर मैं ठहर गया और आवाज पर कान देने लगा, 'साहब, अब मैं मां बनने वाली हूं। मैं गरीब हूं, कहां अपनी बदनामी ले जाऊंगी। मेरा कुछ इंतजाम कर दो। मुझा गरीब पर तरस खाओ।'
मैंने उचककर देखा, तो हैरान रह गया। मेरी बहन जमींदार के लड़के के सामने गिड़गिड़ा रही थी। मैं जमींदार के लड़के की ओर बढ़ा। मेरे और उसके झागड़े के बीच उसी के चाकू से उसकी हत्या हो गई। मैं पकड़ा गया और मुझो लंबी सजा सुनायी गई।'
'फिर तुम्हारे परिवार के लोगों का क्या हुआ?'
'सजा काटकर गांव आया, तो गांव के बाहर ही एक आदमी ने बताया, तुम्हारे जेल जाने के बाद तुम्हारी मां फंदा लगा कर मर गई। ज्यादा शराब पीने की वजह से तुम्हारा बाप बीमार होकर मर गया। तुम्हारी बहन को जमींदार के आदमियों ने गायब कर दिया। कुछ लोगों का कहना है कि वह बनारस के कोठे पर है।'
'क्या तुमने अपनी बहन को ढूंढ़ा था?'
'हां, बहन मुझो बनारस के कोठे पर मिली, लेकिन उसने मेरे साथ आने से मना कर दिया। वह सोचती होगी, वहां से निकलकर फिर उसे भूख और गरीबी का सामना करना पड़ेगा। मैं जेली उसे क्या दे सकता हूं? बदनामी, बदचलनी, भूख और गरीबी की मार सहते-सहते मेरा परिवार खत्म हो गया।'
वह खामोश हो गया। उसके चेहरे को देखने से लगा, जैसे उसमें अथाह पीड़ा भर दी गई हो।
'आलमबाग का चौराहा तो आ गया बाबूजी'... अचानक उसने चौंकाया।
'उस दुकानदार से पूछकर आना कि स्लीपर ग्राउंड कॉलोनी किधर पड़ेगी।' मैंने उससे कहा।
थोड़ी देर में उसने लौटकर बताया- 'साहब, थोड़ी दूर पर ही है।' इतना कहकर वह रिक्शा उसी दिशा की ओर ले चला। थोड़े से घुमाव के बाद उसने मुझो स्लीपर ग्राउंड कॉलोनी में पहुंचा दिया। कुछ बंगलों के बाद मुझो बी.ए., श्रीवास्तव के नाम का बंगला दिखाई दे गया।
मैं कुछ ज्यादा पैसा देने लगा तो वह बोला- 'बाबूजी, क्या करूंगा ज्यादा पैसे लेकर? मेरे सुख-दु:ख में शामिल होने वाला है ही कौन?' वह अपने तय किए हुए पैसे लेकर चला गया। उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। हालांकि मैं उसे तब तक देखता रहा जब तक वह मेरी आंखों से ओझाल नहीं हो गया। सहसा मैं मुड़ा और मेरा हाथ कालबैल के स्विच की ओर बढ़ गया।

Published on:
05 Jun 2018 04:09 pm
बड़ी खबरें
View Allखास खबर
ट्रेंडिंग
