
विशाल सूर्यकांत/ जयपुर। दुनिया का सबसे युवा देश और इस देश में बेबस होता बचपन। जिस तरह से देश में बच्चों में आत्महत्याओं के मामले बढ़े हैं, जिस तरह से आपस की मामूली बांतों में या कई बार किसी तीसरी वजह से हत्या की घटनाएं सामने आई हैं वो बैचेन कर रही हैं। परिवार में अगर बचपन है तो वो सबका लाड़ला है। बच्चों की परेशानी यूं समझिए कि वो भीड़ में भी अकेला है,तन्हा है। मां-बाप की आंखों के तारे जिन्हें कहते हैं,उन बच्चों के मन का मासूम आसमान सुना है...दिल की बात कहने और सुनने का क्षितिज वीरान है क्योंकि परिवार, समाज और स्कूलों में ऐसे लोग कम होते जा रहे हैं जिनसे दिल की बात की जा सके।
जहां जाएं वो उम्मीदों की गठरी है...बोझिल बस्ते हैं। न शरीर हल्का है और न ही मन। इसीलिए नवीं क्लास का बच्चा नितांत,स्कूल पीटीआई से परेशान होकर आत्महत्या कर लेता है और दीवार पर लिख जाता है 'नीडेड जस्टिस'। इसी तरह शुक्रवार की शाम बांसवाड़ा में सात साल के बच्चे को मां की ही डांट सहन नहीं हुई और ज़हर खाकर जान दे दी। तीसरा मामला और लीजिए तमिलनाडू का...यहां एक बच्चे ने सोसाइट कर लिया। वजह न तो स्कूल थी और न हीं कोई औरों से अदावत...वजह थी पिता की शराब की लत...। दिनेश नाम का ये बच्चा बस सोसाइट नोट में हीं अपने मन की बात खुलकर कह पाया...बच्चा लिख गया कि पापा...मेरे मरने के बाद तो शराब छोड़ देना ...।
ये मामले क्या सिर्फ तीन बच्चों के हैं...ये तीन बच्चे न जाने कब से इन हालात से गुजर रहे होंगे...ये बच्चों ने न जाने कितनी बार ये चाहा होगा कि कोई उन्हें सुन ले,कोई उन्हें समझा ले...कोई उनकी बात मान ले। अक्सर हमें लगता है कि बच्चों को ही समझाया जाना चाहिए और समझाने का हक़ सिर्फ 'बड़ों' का है। बच्चे,परिवार,समाज और स्कूल की नजर में लगता है कभी बड़े नहीं होते और हम बड़े कभी बच्चे होते नहीं...कौन कहे,कौन सुने...अनकहा गतिरोध बन गया है बच्चों और बड़ों के बीच...।
सोशल मीडिया के दौर में लगता है कि रिश्ते भी धीरे-धीरे वर्चुअल वर्ल्ड में तब्दील होते जा रहे हैं। अपनी जिम्मेदारियों और अपने में व्यस्त रहना बड़ों की मजबूरी है और बच्चों के लिए वक्त निकालना बेहद जरूरी है...चुनौती वाकई बड़ी होती जा रही है। देश में स्टूडेंट सुसाइड के मामले बढ़े है,देश में बच्चों के हाथों से होने वाले अपराध चाहे वो हत्या हो या फिर दुष्कर्म जैसे मामले बढ़े हैं।
बचपन और किशोरावस्था को लेकर कई स्थितियां हैं। पहली स्थिति ये कि बच्चों में सोसाइट के मामले बढ़े हैं, दूसरी स्थिति ये कि बच्चों के खिलाफ अपराध बढ़े हैं और तीसरी स्थिति ये कि बच्चों के द्वारा होने वाले अपराध भी बढ़े हैं। इस देश में 2016 में 9 हजार 474 युवाओं ने आत्महत्या की।
जिसमें पढ़ाई में लगातार अच्छा करने का दबाव सबसे बड़ी वजह बना। 2007 की तुलना में 2,916 में 52 फीसदी मामले बढ़े है। परीक्षा में फेल होने की वजह से 2 हजार 413 बच्चों ने की आत्महत्या, महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 1350 सुसाइड के मामले सामने आए, पश्चिम बंगाल में 1 हजार 147 बच्चों ने आत्महत्या कर ली। बच्चों में बढ़ता एकाकीपन कई और अपराधों का कारण भी बन रहा है।
बच्चे अकेलेपन में वर्चुअल वर्ल्ड में गुम हो रहे हैं और अनजाने लोगों के संपर्क में आकर कभी व्लू व्हेल तो कभी टिंडर जैसी डेटिंग एप से जुड़ जा रहे हैं। दोनों के ही खतरनाक दुष्प्रभाव हमारे सामने हैं। जयपुर के आमेर क्षेत्र में सूटकेस में एक किशोर का शव मिला। पहचान झोटवाड़ा निवासी दुष्यन्त शर्मा के रुप में हुई और हत्या के पीछे कारण टिंडर जैसी डेटिंग एप को वजह बताया जा रहा है।
हमारे बच्चे अगर एकाकीपन में रहते हैं तो इसमें सीधी जिम्मेदारी अभिभावकों की बनती है। सम्मिलित परिवारों में तो फिर भी बच्चे संभल जाते थे। न्यूक्लियर फैमिली के दौर में संस्कार,विश्वास, प्यार और दूलार माता-पिता की व्यस्तता पर निर्भर करता है। विकसित देशों में तो सरकार पेरेन्टिंग में भी दखल रखती है। बच्चा होने से पहले और बाद में काउंसलिंग और सख्त निगरानी भी।
लेकिन भारत जैसे देश में जहां आबादी, परम्पराएं,सामाजिक विविधता ज्यादा है। विदेशों की तर्ज पर सरकार का पूरा दखल संभव नहीं। लेकिन कुछ बाध्यताएं,नीतियां वक्त की जरुरत बनती जा रही हैं क्योंकि स्कूल और अभिभावक एक-दूसरे पर जिम्मेदारियां थोपते ज्यादा दिख रहे हैं जबकि दोनों को एक दूसरे का पूरक होने चाहिए थे। चाहे घर-परिवार हो, स्कूल हो या फिर समाज, बच्चों के साथ बच्चे बनकर उनके मन की बात समझना जरूरी है। अनावश्यक प्रतिस्पर्धाओं की रेस में दौडाएंगे तो हो सकता है कि रेस जीत जाएं लेकिन बचपन और युवामन पीछे छूट जाएगा।
ये जरूरी नहीं कि सिर्फ आपका बच्चा ही अच्छा हो, ये जरूरी नहीं कि आपका स्टूडेंट ही अच्छा हो...। जरूरी ये भी है कि आप भी उनके लिए अच्छे हों। अच्छे अभिभावक,अच्छे शिक्षक और अच्छे नागरिक...बचपन और युवा मन,आपसे कुछ कह रहा है मगर क्या आप सुन रहे हैं ...?
लोकसभा में रखी गई फैक्टचैकर रिपोर्ट में बताया गया कि छात्र आत्महत्याओं के मामलों में 2007 की तुलना में 2016 में 52 फीसदी बढ़ोतरी हुई
आकंडों की जुबानी, भारतीय बचपन-युवामन की कहानी
भारत में हर घंटे एक छात्र आत्महत्या करता है
15 से 29 आयुवर्ग में भारत में विश्व की सर्वाधिक आत्महत्या दर
सीबीएसई गाइडलाइंस के अनुसार फुलटाइम स्टूडेंट काउंसलर जरूरी
एनसीआरबी के अनुसार 2015 में 8,934 छात्रों ने की खुदकुशी
2011 से 2015 में 40 हजार छात्रों ने की खुदकुशी
2013 में 2,471 छात्रों ने परीक्षा में फेल होने पर की खुदकुशी
देश में हर घंटे एक बच्चा आत्महत्या कर रहा है
एनसीआरबी के आंकडों से सामने आई गंभीर स्थिति
2011 से 2015 के बीच पांच सालों में देश भर में करीब 40 हजार बच्चों ने आत्महत्या कर ली इसके पीछे घरेलु परिस्थितियों भी बड़ी वजह
दुनिया में बढ़ता जा रहा है मानसिक अवसाद
हर साल विश्व में 8 लाख आत्महत्याएं
हर साल भारत में 2 लाख लोग करते हैं आत्महत्याएं
विश्व में हर साल कुल आत्महत्याओं में 25 फीसदी आत्महत्याएं भारत में
07 करोड़ भारतीय मानसिक बीमारियों से ग्रसित हैं
20 फीसदी भारतीय मानसिक समस्याओं से ग्रस्त होंगे 2020 तक: डब्ल्यूएचओ
भारत विश्व का सबसे तनावग्रसित देश: डब्ल्यूएचओ
10 अक्टूबर, 2014 को केंद्र सरकार ने बनाई नई मानसिक स्वास्थ्य नीति
कॉरपोरेट क्षेत्र मे काम करने वाले 50 फीसदी लोग स्थायी तनाव ग्रसित हैं
3800 प्रशिक्षित मनोचिकित्सक हैं भारत में 2015 की एक रिपोर्ट अनुसार
15-35 वर्ष के युवाओं की मौतों का तीसरा बड़ा कारण है आत्महत्या
26 हजार से कम बैड हैं भारत में मानसिक रोगियों के लिए
देश में 0.05 मनोचिकित्सक हैं प्रति 1 लाख की आबादी पर
विश्व के 20 फीसदी बच्चे और किशोर मानसिक बीमारियों/समस्याओं से ग्रसित
देश में वर्तमान में 20 फीसदी युवाओं को मानसिक अवसाद
Published on:
04 May 2018 10:03 pm
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