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इस जैन मंदिर से सात बार निकाली अलौकिक प्रतिमा

आठ गगनचुंबी व बारह छोटे शिखर करते आकर्षित

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jain temple

जयपुर . प्राचीन स्थापत्य कला का प्रतिनिधित्व करता सांगानेर का जैन अतिशय मंदिर 11 सौ वर्ष पुराना है। मान्यताओं के अनुसार मंदिर का निमार्ण कई चरणों में किया गया। मंदिर प्रबंधक ने बताया कि मंदिर में आठ गगनचुंबी शिखर व बारह छोटे शिखर निर्मित है। इसे दूर से देखकर ही दर्शकों के मन में जिन-बिम्बों के दर्शनों की इच्छा हो जाती है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर बनी प्राचीन कलाकृतियों को देखने पर दिलवाड़ा के मंदिरों की याद ताजा हो जाती है। मंदिर के दूसरे चौक में पाषाण की तीन शिखरों की वेदी बनी है। इसमें कमल पुष्प बेल व तीर्थकरों के सिर पर जलाभिषेक करते हुए हाथियों का शिल्प-सौष्ठव देखते ही बनता है। इन प्रतिमाओं पर अंकित लेख इतिहास की धरोहर माना जाता है। वेदी के पृष्ठभाग में भगवान आदीनाथ की प्रतिमा है जो काफी प्राचीन है।यह प्रतिमा प्रतिक्षण अपना रूप परिवर्तित करती है।जो हमें सदैव आत्मबल व प्रतिक्षण नई दिशा प्रदान करती है।यह चतुर्थकालीन महाअतिशयकारी प्रतिमा सांगानेर वाले बाबा के नाम से प्रसिद्ध है।

विशेषताओं से परिपूर्ण है यह मंदिर

मंदिर की विशेषताएं जानने श्रद्धालु उत्सुक रहता है। मंदिर सात मंजिला है। चैत्यालय तलघर के मध्य में यक्षदेव द्वारा रक्षित प्राचीन जिन चैत्यालय विराजमान है। यह जिस स्थान पर विराजमान है।वहां केवल बालयती तपस्वी दिगम्बर साधु ही अपनी तपस्या के बल पर प्रवेश कर सकते है। चैत्यालय को श्रद्दालुओं के दर्शनों के लिए बाहर निकालने के लिए तपस्वी साधु को संकल्प शक्ति व्यक्त करनी पड़ती है।संकल्प समय में ही इसे वापस ले जाना पडता है। विलम्ब करने पर अनेक अशुभ संकेत देखने को मिले है। वहीं मंदिर के दोनों तरफ भक्तामर स्त्रोत के ४८ काव्यों को सचित्र दीवारों पर उत्कीर्ण किया हुआ है।

1933 शांतिसागर महाराज
1971 देवभूषण महाराज
1986 विमल सागर महाराज
1992 गणधराचार्य कुुन्थु सागर महाराज
1994 व 1999 सुधा सागर महाराज
2017 दिगम्बर जैन संतों के तपोबल से

जानिए मंदिर की स्थापना के बारे में

एक पौराणिक कथा के अनुसार इस स्थान पर पहले हीरा-जवाहरात का कार्य किया जाता था। इसी स्थान पर एक बावड़ी थी। व एक छोटा सा स्थान बना हुआ था।यहां पर एक जैन साधु रहते थे। एक दिन किसी एक धार्मिक आयोजन को दौरान बिना सारथी का रथ आया। जिस पर भगवान आदीनाथ की मूर्ति विराजमान थी। रथ इस स्थान पर आकर रुक गया। स्थानीय राजा सहित पूरी प्रजा ने अगले दिन तक रथ के सारथी का इंतजार किया,लेकिन कोई नहीं मिला। तब जैन श्रेष्टी भगवान दास ने राजा व प्रजा की सहमति से मूर्ति को यहां ही विराजमान कर दिया। मूर्ति को रथ से उतारने के बाद रथ अदृश्य हो गया।


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