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राजस्थान सरकार ने क्या कदम उठाए: सुप्रीम कोर्ट

मॉब लिंचिंग: रकबर की पीट-पीटकर हत्या मामले में जवाब तलब
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जयपुर

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Anoop Singh

Aug 21, 2018

nics

Police

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने राजस्थान सरकार से पूछा कि क्या उन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है, जिन्होंने गौ-तस्करी के नाम पर पीट-पीटकर अधमरा कर दिए गए व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने में तीन घंटे का समय लगा दिया था।
अलवर में इसी साल जुलाई में भीड़ द्वारा पीट-पीटकर रकबर की हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार से जवाब मांगा है। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने अदालत की अवमानना के लिए राज्य सरकार के खिलाफ कार्रवाई की मांग वाली एक याचिका पर राजस्थान के गृह विभाग के प्रधान सचिव से भविष्य में पीट-पीटकर हत्या की घटनाओं को रोकने के लिए उठाए गए कदमों पर हलफनामा दाखिल कर जवाब देने को कहा है।
शीर्ष अदालत ने एक हफ्ते में हलफनामा दाखिल करने की बात कहते हुए मामले की सुनवाई 30 अगस्त तय की है। इस मामले में याचिकाकर्ता तहसीन पूनावाला की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने राज्य सरकार के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की। अलवर में 24 जुलाई को गौरक्षा के नाम पर हिंसक भीड़ ने 28 वर्षीय रकबर खान की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी।
राजस्थान सरकार की ओर से पेश वकील ने शीर्ष अदालत को बताया कि कार्रवाई की गई है। गौरतलब है कि शीर्ष अदालत देश में लगातार पीट-पीटकर भीड़ द्वारा की जा रही हत्या की घटनाओं पर केंद्र और राज्य सरकारों की कड़ी आलोचना कर चुकी है। अदालत ने इस अपराध से निपटने के लिए संसद से इस पर कानून बनाने के लिए विचार करने का आग्रह किया है।
भीड़ की हिंसा से निपटने के लिए बदलेगा कानून, राहत कोष भी
नई दिल्ली. भीड़ की हिंसा के बढ़ते मामलों को मद्देनजर केंद्र सरकार जल्दी ही मौजूदा कानूनों में बदलाव के साथ नया कानून भी ला सकती है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित मंत्रालय की समिति के साथ काम रहे अनौपचारिक समूह ने अपनी रिपोर्ट में भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) और दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) में कुछ प्रावधानों का सुझाव दिया है। इनमें हिंसा में शामिल लोगों पर कार्रवाई के लिए पुलिस को ज्यादा अधिकार, अपराध को गैर-जमानती बनाना, विशेष अदालतों में मामलों की तेज सुनवाई व पीडि़तों को केंद्रीय फंड से मुआवजे के लिए राहत कोष का गठन शामिल है। समूह का मानना है कि पीडि़तों या उनके परिजनों को तत्काल आर्थिक मदद मिले।