
Illegal Mining(AI Image-ChatGpt)
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए संकेत दिया कि राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैले राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य क्षेत्र में अवैध रेत (बजरी) खनन को रोकने में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने स्वत: संज्ञान लेते हुए इस मामले की सुनवाई की और स्पष्ट किया कि संरक्षित क्षेत्र में वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास (हेबिटाट) को नुकसान पहुंचाने वाला कोई भी कार्य गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।
पीठ ने कहा कि इस तरह की गतिविधियां न केवल वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, बल्कि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, वन संरक्षण अधिनियम और जैविक विविधता से जुड़े अन्य कानूनों का भी उल्लंघन करती हैं। ऐसे मामलों में दोषियों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है। अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर चिंता जताई कि अवैध खनन लंबे समय से जारी है, जो संबंधित विभागों की निष्क्रियता और सुस्ती को दर्शाता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि तीनों राज्यों के वन विभाग, खनन विभाग, जल संसाधन विभाग और पुलिस प्रशासन के अधिकारी इस स्थिति के लिए परोक्ष रूप से जिम्मेदार माने जा सकते हैं। यदि वे समय पर कार्रवाई करते, तो इस तरह की अवैध गतिविधियों को रोका जा सकता था। उनकी निष्क्रियता ने न केवल अवैध खनन को बढ़ावा दिया, बल्कि वन्यजीवों के आवास को भी गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया।
पीठ ने आगे कहा कि इस मामले में सभी संबंधित विभागों से जवाब मिलने के बाद आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे। अदालत ने राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के वन, जल संसाधन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन तथा खनन विभाग के सचिवों के साथ-साथ पुलिस प्रमुखों को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए हैं। यह मामला पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि संरक्षित क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और जिम्मेदार अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 2 अप्रैल को निर्धारित की गई है, जिसमें आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
Published on:
21 Mar 2026 05:00 am
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