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सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु पर दिया ऐतिहासिक फैसला, जानिए इस मुद्दे से जुड़ी हर अहम बात…

सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु पर ऐतिहासिक फैसला दिया है।  

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जयपुर

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Nidhi Mishra

Mar 09, 2018

Supreme Court Verdict on Euthanasia- Mercy Killing in India

Supreme Court Verdict on Euthanasia- Mercy Killing in India

इच्छामृत्यु यानी यूथनेशिया पर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ मर्सी किलिंग को वैध ठहराया है। इच्छामृत्यु पर काफी लम्बे समय से बहस चल रही थी और मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन था। आपको बता दें कि दुनियाभर में इच्छामृत्यु की अनुमति के लिए मांग बढ़ रही थी। भारत में भी कई लोग इसके पक्षधर थे। राजस्थान के जयुपर में भी कैंसर से परेशान एक महिला ने संथारा लेकर मौत को गले लगा लिया था। आइए आपको बताते हैं क्या है इच्छामृत्यु... राजस्थान सहित देशभर में कब कब इच्छामृत्यु के लिए मांग की गई... साथ ही इच्छामृत्यु से जुड़े कानून और दूसरी अहम बातें...

यूथेनेसिया यूनानी भाषा से निकला शब्द है, जिसका मतलब होता है इच्छा से मृत्यु ले लेना। ये मुद्दा क़ानूनी तो है ही साथ ही मेडिकल और समाज से भी जुड़ा है। इस संवेदनशील मुद्दे पर व्यापक बहस लम्बे समय से जारी थी। मेडिकल साइंस में इच्छा-मृत्यु के कई अर्थ हैं, जिन्हें क्लिनिकल दशाओं के आधार पर परिभाषित किया जाता है। जैसे—

1. वॉलंटरी एक्टिव यूथेनेसिया— पेशेंट की स्वीकृति बाद उसे ऐसी दवाइयां दी जाती हैं, जिससे उसकी मौत हो जाए। हालांकि ये प्रैक्टिस केवल नीदरलैंड और बेल्जियम में है।

2. इन वॉलंटरी एक्टिव यूथेनेसिया— इस केस में मानसिक तौर पर बीमार मरीज जो अपनी मौत की स्वीकृति ना दे सके, उसे जानबूझ कर मरने के लिए दवाइयां देना। ये पूरी दुनिया में वैध नहीं है।

3. पैसिव यूथेनेसिया— इसमें मरीज़ की मृत्यु के लिए इलाज बंद कर दिया जाता है या फिर जीवनरक्षक प्रणालियों को हटा दिया जाता है। पूरी दुनिया में इस प्रैक्टिस को कानूनी माना गया है।

4. एक्टिव यूथेनेसिया— इस प्रैक्टिस में अफ़ीम से बनने वाली या दूसरी दवाइयां देकर मरीज को राहत दी जाती है, लेकिन बाद में उसकी मौत हो जाती है। कुछ देशों में ये वैध है।

5. असिस्टेड सुसाइड— इसमें पहले से सहमति होती है। इसी आधार पर डॉक्टर मरीज को ऐसी दवाइयां देता है, जिन्हें खाने के बाद आत्महत्या की जा सकती है। यह तरीक़ा नीदरलैंड, बेल्जियम, स्विट्ज़रलैंड और अमेरिका के ओरेगन राज्य में वैध है।

इच्छामृत्यु से जुड़े भारत के मामले

1. देश के बिहार राज्य की राजधानी पटना के निवासी तारकेश्वर सिन्हा ने 2005 में राज्यपाल को अपनी की इच्छामृत्यु के लिए याचिका दी। सिन्हा की पत्नी कंचनदेवी, साल 2000 से बेहोश थीं।

2. हैदराबाद के व्यंकटेश का मामला भी काफी चर्चा में रहा। 25 साल के इस युवक ने मरने से पहले अपने सारे अंग दान करने की इच्छा व्यक्त की थी, जो नामंजूर कर दी गई।

3. केरल हामंज़ूरी मिली और टेरी की आहार नली हटा ली गई।

क्या कहता है भारतीय क़ानून

भारत में इच्छा-मृत्यु और दया मृत्यु दोनों ही अवैधानिक हैं। आईपीसी की धारा 309 के अंतर्गत इच्छा-मृत्यु आत्महत्या का अपराध माना गया है। आईपीसी की धारा 304 के अंतर्गत दया मृत्यु सदोष हत्या का अपराध माना जाता है।


मरने का अधिकार भी होना चाहिए

पी. रथीनम् बनाम भारत संघ (1984) के मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 309 की संवैधानिकता पर कहा गया कि ये धारा संविधान के अनुच्छेद 21 के खिलाफ है। इसका मतलब ये कि जब जीने का अधिकार है तो मरने का भी होना चाहिए। पर साल 1996 में उच्चतम न्यायालय ने ज्ञानकौर बनाम पंजाब राज्य के मामले में इस डिसिजन को पलट दिया और कहा कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत 'जीवन के अधिकार' में मृत्यु का अधिकार शामिल नहीं है। इसलिए धारा 306 और 309 संवैधानिक और मान्य हैं।

क्विक फैक्ट्स


—साल 1995 में ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी राज्य में यूथेनेसिया बिल को मंज़ूरी मिली।

—वर्ष 1994 में यूएस के ओरेगन राज्य में यूथेनेसिया को मान्यता मिली।

—अप्रैल 2002 में नीदरलैंड (हॉलैंड) में यूथेनेसिया को विशेष दशा में वैधानिक माना गया।

—सितम्बर 2002 में बेल्जियम में भी इच्छा मृत्यु को मान्यता मिली।

—साल 1937 से स्विट्ज़रलैंड में डॉक्टरी मदद से आत्महत्या को मान्य माना गया है।

यूथेनेसिया पर दुनियाभऱ में हुई चर्चा

इच्छामृत्यु यानी यूथेनेसिया पर अमेरिकी महिला टेरी शियावो के मामले ने दुनियाभर से चर्चा बटोरी। फ़्लोरिडा की टेरी शियावो 41 साल की थीं, 1990 में उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। टेरी शियावो पिछले साल चल बसीं। फ़्लोरिडा की इस महिला को 1990 में दिल का दौरा पड़ा था। उसके बाद से ही टेरी का दिमाग डेथ तक सुन्न रहा। टेरी के पति ने उसकी मृत्यु को लेकर सात साल तक क़ानूनी लड़ाई लड़ी। टेरी का पति उसकी मौत चाहता था, लेकिन उसके माता पिता अपनी बेटी को जिंदा रखना चाहते थे। एक लंबी लड़ाई के बाद आख़िरकार टेरी के पति को अदालत से मंज़ूरी मिली और टेरी की आहार नली हटा ली गई।

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