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बिना अध्यक्ष का राजस्थान BJP, तमाम ‘गणित’ के बावजूद एक नाम के ‘भंवर’ में फंसी पार्टी

Suspense On Rajasthan BJP President: 'गणित' के बावजूद एक नाम के 'भंवर' में फंसी पार्टी
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rajasthan bjp president name

जयपुर।

पिछले एक माह से ज्यादा समय से खाली पड़ी भाजपा प्रदेशाध्यक्ष की कुर्सी अब एक नाम के भंवर में फंस गई है। पार्टी आलाकमान ने प्रदेशाध्यक्ष पद के लिए एक नाम सुझाने को कहा है, लेकिन यहां सभी चुनावी व जातिगत समीकरणों में सिर खपाने के बाद भी गणित सुलझ नहीं पा रही। ऐसे में फिर पार्टी नेता 'ये नहीं तो वो' के विकल्प ढूंढ रहे हैं।

पार्टी के शीर्ष नेता पिछले करीब पंद्रह दिनों से नए अध्यक्ष के नाम पर दिमाग खपा रहे हैं। हाल ही में भाजपा प्रदेश कोर कमेटी की बैठक में भी इस मुद्दे पर औपचारिक-अनौपचारिक रूप से मंथन किया गया, लेकिन पार्टी नेताओं को ऐसा एक नाम मिल ही नहीं पा रहा जो सभी समीकरणों व चुनावी गणित पर फिट बैठ रहा हो।

कोर कमेटी की बैठक में खुद मुख्यमंत्री व अन्य दिग्गज नेता तय नहीं कर पा रहे हैं कि किसका नाम सुझाया जाए। दूसरी ओर पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने अपनी पंसद नकारे जाने के बाद एक नाम की मांग कर गेंद प्रदेश नेताओं के पाले में डाल रखी है।

प्रदेश कोर कमेटी की पिछली बैठक में भी नए प्रदेशाध्यक्ष के एक नाम पर सहमति नहीं बना पाई थी। इस बार भी कई नामों पर विचार तो हुआ, लेकिन कोई न कोई पेंच ऐसा फंसा कि फैसला नहीं हो पाया। कारण साफ है कुछ महीनों बाद ही राज्य में चुनाव हैं। जल्दबाजी में कोई भी फैसला गरीबी में आटा गीला कर सकता है। ऐसे में कोई नाम तय ही नहीं हो पा रहा और बिना प्रदेशाध्यक्ष के पार्टी के काम एक तरह से ठप पड़े हैं।

कहीं कोई नाराज न हो जाए
पार्टी सूत्रों का कहना है कि नाम तो कई सामने आए हैं, लेकिन उस पर मुहर लगाने से किसी नेता या वर्ग विशेष के भड़कने का डर सता रहा है। पार्टी आलाकमान ने केंद्रीय मंत्री गजेंद्रसिंह शेखावत का नाम आगे किया था, जिसका विरोध हो गया। इसके पीछे कहा गया कि शेखावत को प्रदेशाध्यक्ष बनाने से जाट वर्ग पार्टी से टूट सकता है।

फिर नाम आया केंद्रीय मंत्री अर्जुन मेघवाल का, ताकि अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों की नाराजगी को चुनावों में साधा जा सके, लेकिन 2 अप्रेल को भारत बंद के बाद सवर्णों की नाराजगी बढ़ने के कारण पार्टी रिस्क लेने की स्थिति में नहीं है।

एक बार हाल ही भाजपा में आकर राज्यसभा पहुंचे किरोड़ीलाल मीणा का नाम भी उभरा, लेकिन उनकी स्वीकार्यता और गुर्जर फैक्टर आड़े आ रहा है। ऐसे में एक नाम काबिना मंत्री अरुण चतुर्वेदी का भी सामने आया, लेकिन सवाल आकर खड़ा हो गया कि चतुर्वेदी प्रदेशाध्यक्ष बनते हैं तो मंत्री पद छोड़ना पड़ेगा।

मंत्रिमंडल में उनकी जगह लेने वाला कोई और प्रभावी ब्राह्मण नेता नजर नहीं आ रहा। किसी ब्राह्मण को मंत्री नहीं बनाया जाता है तो भी नाराजगी का डर है। एक राय इस्तीफा दे चुके अशोक परनामी को ही वापस प्रदेशाध्यक्ष बनाने की भी आई, लेकिन यह सौदा महंगा साबित होने की आशंका बनी हुई है।

ये नहीं तो वो सही
सूत्रों का कहना है कि एक नाम पर सहमति नहीं बनने की स्थिति में पार्टी वैकल्पिक नामों का प्रस्ताव आलाकमान को भेजने पर विचार कर रही है। इससे पहले वैकल्पिक नामों वाले नेताओं और उनके प्रमुख समर्थकों से सहमति लेने की कवायद भी जारी है, ताकि विरोध के स्वर कम उठें। पार्टी नेताओं का मानना है कि प्रदेशाध्यक्ष चयन में पहले से ही बहुत देरी हो चुकी है। अब एक एक दिन की देरी पार्टी पर भारी पड़ रही है। केंद्रीय नेतृत्व की ओर से सामने आया नाम ठुकराए जाने के बाद वैसे भी रिश्ते तनावपूर्ण हो चुके हैं। ऐसे में किसी बीच के रास्ते के लिए संघ की ओर भी केंद्र और राज्य के नेता टकटकी लगा रहे हैं।