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राजस्थान का Thar रेगिस्तान था दुनिया के सबसे पुराने डायनासोर का घर

Thar Desert Home To Oldest Dinosaurs : दुनिया के विभिन्न कोनों से डायनासोर के अवशेषों के मिलने की खबरें हम अक्सर पढ़ते रहते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं अपने समय में दुनिया के सबसे खतरनाक जीव राजस्थान की धरती पर दौड़ते थे डायनासोर।

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Thar Desert Home To Oldest Dinosaurs

Thar Desert Home To Oldest Dinosaurs

Thar Desert Home To Oldest Dinosaurs : दुनिया के विभिन्न कोनों से डायनासोर के अवशेषों के मिलने की खबरें हम अक्सर पढ़ते रहते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं अपने समय में दुनिया के सबसे खतरनाक जीव राजस्थान की धरती पर दौड़ते थे डायनासोर। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) (GSI) और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी)-रूड़की (IIT Roorke) के वैज्ञानिकों ने लंबी गर्दन, पौधे खाने वाले डाइक्रायोसॉरिड डायनासोर (Dinosaur) के सबसे पुराने जीवाश्म अवशेषों की खोज की है।

यह खोज राजस्थान के जैसलमेर में की गई थी। व्यवस्थित अन्वेषण और उत्खनन प्रोग्राम के बाद 2018 में क्षेत्र से जीवाश्म अवशेष एकत्र किए गए थे। वैज्ञानिकों के एक समूह ने इस पर करीब 5 साल तक शोध किया।

डायनासोर के विकास का प्रमुख केंद्र
वैज्ञानिकों के अनुसार, खोज से यह भी पता चलता है कि भारत डायनासोर के विकास का एक प्रमुख केंद्र था। जीवाश्मों को देबाशीष भट्टाचार्य की देखरेख में जीएसआई अधिकारी कृष्ण कुमार, प्रज्ञा पांडे और त्रिपर्णा घोष द्वारा एकत्र किया गया था।

167 मिलियन वर्ष पुराने अवशेष
अवशेष न केवल 167 मिलियन वर्ष पुराने हैं, बल्कि वे एक नई प्रजाति के हैं जो अब तक वैज्ञानिकों के लिए अज्ञात थे।

थार रेगिस्तान पर नामकरण
नए डायनासोर का नाम 'थारोसॉरस इंडिकस' रखा गया है; पहला नाम थार रेगिस्तान को संदर्भित करता है जहां जीवाश्म पाए गए थे और दूसरा नाम इसके मूल देश, यानी भारत के नाम पर है।

अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित अध्ययन
यह जानकारी नेचर के प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय पत्रिका 'साइंटिफिक रिपोट्र्स' में छपे अध्ययन में सामने आई थी।

पहले अफ्रीका और अमरीका में पाया जाता था
वैज्ञानिकों के अनुसार, डाइक्रायोसॉरिड डायनासोर के जीवाश्म उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका, एशिया (चीन) में पाए गए हैं लेकिन भारत में ऐसे जीवाश्मों की जानकारी नहीं थी।

इन लोगों ने लगाया पता
बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट पुरापाषाण विज्ञान के पूर्व निदेशक सुनील बाजपेयी, जो वर्तमान में पृथ्वी विज्ञान विभाग, आईआईटी-रुड़की में कशेरुक पुरापाषाण विज्ञान के अध्यक्ष प्रोफेसर हैं और उनके आईआईटीआईएन सहयोगी देबजीत दत्ता ने जीवाश्मों की विस्तृत जांच की।

वैज्ञानिकों की राय
सुनील बवंसल ने कहा, जिन चट्टानों में ये जीवाश्म पाए गए, वे लगभग 167 मिलियन वर्ष पुरानी हैं, जो इस नए भारतीय सॉरोपॉड को न केवल सबसे पुराना ज्ञात डाइक्रायोसॉरिड बनाता है, बल्कि विश्व स्तर पर सबसे पुराना डिप्लोडोकोइड भी बनाता है।