आधी सदी में ही मंडफिया के श्रीसांवलियाजी मंदिर की ऐसी प्रसिद्धि फैली कि यह मन्दिर अब चौथी बार अक्षरधाम की तर्ज पर संवर रहा है।
मंडफिया के रोडूलाल दर्जी ने बताया कि पहले यहां नरबदिया मंदिर जैसा मंदिर था। निज मन्दिर के आगे खुला चौक और चारों ओर तीन-तीन महराबदार दरवाजों वाले पक्के तिबारे थे।
इन दोनों मन्दिरों का एक ही कारीगर भदेसर का कादर बक्ष नीलगर था। बाद में उसके बेटे रहीम बक्ष ने मन्दिर में कार्य किया।
8 5 वर्षीय गफूर, 8 3 वर्षीय शकुरा बाई, जमाल मिस्त्री, नूर मोहम्मद, पीरू बा, शफी मोहम्मद, अहमद शाह आदि दर्जनों मुस्लिम जनों ने कारीगरी और बेलदारी कार्य कर मंदिर निर्माण में योगदान दिया था।
मन्दिर के विकास यात्रा की खोजबीन में इस मन्दिर के पुजारियों के बड़वा गंगाराम और कोटा के मदनलाल से भेंट हुई। बड़वाओं की पौथियों के अनुसार सांवलियाजी की मूर्ति व ऐसी ही दो और मूर्तियां लगभग 250 वर्ष पूर्व संवत 18 25 में उदयपुर-चित्तौडग़ढ़ मार्ग पर ग्राम बागुण्ड के छापरड़ा से प्राप्त हुई।
इनमें से एक मूर्ति निकट के ही ग्राम भादसौड़ा में है तथा दूसरी बागुण्ड में देवरी बना कर स्थापित की गई। तीसरी मूर्ति मण्डफिया में लाई गई और भोलेराम गुर्जर के खेत पर घर की परेण्डी में बिराजमान कराई। ग्रामवासियों ने पौष सुद बारस संवत 1948 के दिन सांवलिया मन्दिर की नींव भदेसर निवासी कादर खां के हाथों रखवाई व छोटा सा मन्दिर बनाया।
तब यह मन्दिर ऐसा ही था जैसा आज नरबदिया ग्राम में है। यह ग्राम अमरा भगत के नाम से प्रसिद्ध है। मन्दिर के सन्दर्भ में 75-8 0 साल के दर्जनों वयोवृद्धों ने अनुभव व्यक्त किए। इस गांव की बेटी 90 वर्षीया नर्बदा बाई ने बताया कि यहां उसके बचपन में छोटी सी मन्दिरी के पास मिट्टी का चौक था, जिसके दोनों ओर दो चमेलिया और एक बाजू में तुलसी थाणा था।
दक्षिण की ओर कुई पर पुजारियों के चड़स चलते थे व खेतों में पिलाई होती थी। निज मन्दिर के पास छोटी सी दान पेटी थी और सामने चौबारा था। 85 वर्षीय सोहनलाल दाधीच बताते हैं कि सांवलियाजी का विग्रह भूमि से करीब 17 फीट ऊंचा कुई की ढूमण पर स्थापित किया गया।
मन्दिर में बिना मूर्ति को हिलाए चार बार मण्डप बनाए गए। मूर्ति स्थापित करने वाले भोलेराम गुर्जर के परिवार के गंगाराम ने बताया कि यहां से कभी कोई साधु संत भूखा न जाए, इसलिए ब्रह्मभोज की उनकी प्रतिज्ञा आज भी कायम है।