
राजस्थान में विकास परियोजनाओं के साथ पर्यावरणीय चुनौतियां भी बढ़ीं
विकास हो, विनाश न हो..... संतुलन ही असली विकास
जयपुर. राजस्थान इंफ्रा डवलपमेंट का केंद्र बन रहा है। सोलर हब से प्रदेश का नाम रोशन हो रहा है तो रिफाइनरी तरक्की के नए आयाम देगी, हाईवे, ट्रांसमिशन लाइन व नए औद्योगिक प्रोजेक्ट्स से विकास की रफ्तार को तेजी मिल रही है। अब विभिन्न मंचों पर चर्चा होने लगी है कि विकास जरूरी है, लेकिन सवाल है... क्या इसकी कीमत पर्यावरणीय संतुलन, सांस्कृतिक विरासत और भू-संसाधनों को चुकानी होगी? प्रदेश के कई प्रोजेक्ट्स के विरोध में तो लोग सड़कों पर उतर चुके, जिनका मामला विधानसभा से लेकर संसद तक गूंजा। श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ ऐसे क्षेत्र हैं, जहां पानी से फसलें तो लहलहा उठीं, लेकिन कैंसर जैसी बीमारी ने जीवन के प्रति चिंता बढ़ा दी।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अभी संतुलन नहीं साधा गया, तो आने वाले वर्षों में खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
1- सोलर हब की दौड़, खतरे में पर्यावरण व गोडावण
प्रदेश को देश का सबसे बड़ा सोलर हब बनाने की तैयारी चल रही है। इसके लिए खेजड़ी जैसे मरुस्थलीय जीवनरेखा माने जाने वाले पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है। कई जगह ओरण भूमि (जो ग्रामीण समाज की धार्मिक, सांस्कृतिक व पर्यावरणीय पहचान है) को इन प्रोजेक्ट्स के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। सोलर प्रोजेक्ट्स से जुड़ी ट्रांसमिशन लाइनों से गोडावण जैसे दुर्लभ पक्षी खतरे में हैं, जिस पर सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा और पक्षियों की सुरक्षा के लिए निर्देश जारी करने पड़े।
2- रिफाइनरी : अपशिष्ट प्रबंधन बन सकता है खतरा
रिफाइनरी प्रोजेक्ट लगभग तैयार है। इससे रोजगार व औद्योगिक विकास की उम्मीद है, वहीं रिफाइनरी के सह उत्पाद और अपशिष्ट का वैज्ञानिक तरीके से व सुरक्षित उपयोग नहीं हुआ तो पर्यावरण व जन स्वास्थ्य को दुष्परिणाम भोगने पड़ेंगे।
3- बजरी के लिए नदियों को किया जा रहा छलनी
मानक तय होने के बावजूद नदियों में दस मीटर गहराई तक बजरी का अवैध खनन किया जा रहा है। इससे गड्ढे बन गए हैं। पानी निकासी का पैटर्न बदलने से बाढ़ का खतरा बना रहता है और नदियों के आसपास जलीय जीव प्रभावित हो रहे हैं।
4- कचरे से बिजली : ऊर्जा तक ठीक, पर्यावरणीय खतरे का रखें ध्यान
कचरे से बिजली बनाने के प्लांट लग रहे हैं, लेकिन इसके दुष्प्रभावों को लेकर भी चेतावनी आ रही हैं। प्लांट से निकलने वाली राख में भारी धातुएं होती हैं, जो मिट्टी और भू-जल को प्रदूषित कर सकती हैं। गीला व सूखा कचरा अलग न होने से ऐसे प्लांट अधिक प्रदूषण फैलाते हैं।
विशेषज्ञ बोले...
अरावली की पहाड़ियां वर्षा जल रोककर भू-जल रिचार्ज करती हैं, तापमान संतुलित रखती हैं और जैव विविधता की रक्षक हैं। यहां खनन से भू-जल तेजी से घटेगा, हीटवेव की तीव्रता बढ़ेगी, मिट्टी का कटाव होगा और कृषि को नुकसान होगा। शहरी क्षेत्रों में बाढ़, धूल और जल संकट बढ़ेगा।
- डी.एन. पांडे, पर्यावरण विशेषज्ञ (पूर्व आइएफएस)
सोलर पार्कों के लिए चरागाह, ओरण भूमि ली जा रही है और कई क्षेत्रों में खेजड़ी जैसे स्थानीय और संरक्षित वृक्षों की कटाई हुई है। इसके अलावा बड़े सोलर पार्क और ट्रांसमिशन लाइनें पक्षियों और वन्यजीवों के लिए खतरा है। सोलर प्लांटों के आस-पास या बीच में पेड़ लगाए जाने चाहिए।
- हेम सिंह गहलोत, निदेशक (वाइल्ड लाइफ रिसर्च सेंटर), जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय
-विकास और संरक्षण के बीच संतुलन ही टिकाऊ भविष्य की असली कुंजी है। हर प्रोजेक्ट को सस्टेनेबल डवलपमेंट से जोड़ा जाए, स्थानीय पर्यावरण, परंपरागत ज्ञान, जैव विविधता और जनस्वास्थ्य को साथ लेकर चलना जरूरी है।
- सी.एस. पाराशर, पूर्व अतिरिक्त मुख्य नगर नियोजक
Published on:
01 Jan 2026 06:21 pm
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