जयपुर
प्रदेश में सरकार बदल गई लेकिन राजस्थान के 15 सरकारी लॉ कॉलेज ( government law colleges) की मान्यता का मसला अभी तक नहीं सुलझा है। गत 13 सालों में तीन बार राजस्थान की सत्ता में परिवर्तन हुआ है लेकिन सरकारी विधि महाविद्यालयों को स्थाई मान्यता कोई भी सरकार नहीं दिलवा सकी हैं। यही कारण है कि इस साल भी बार कौंसिल आफ इंडिया की मान्यता नहीं मिलने के कारण प्रदेश के सरकारी विधि महाविद्यालयों में अभी तक भी प्रवेश प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई है। ऐसा सिर्फ इस शैक्षणिक सत्र 2019.20 के शुरू होने से पहले ही नहीं हुआ बल्कि गत कई शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले भी मान्यता को लेकर हमेशा से प्रवेश प्रक्रिया देरी से ही शुरू हुई हैं। गत वर्ष भी संसाधनों कमी के कारण बीसीआई (BCI)ने मान्यता नहीं दी थी। जिसके बाद भी संसाधनों की कमी को दूर करने की अंडरटेकिंग देकर करीब चार माह देरी से प्रवेश प्रक्रिया शुरू हुई थी। गत पांच सालों से ऐसा ही चल रहा है कि इन सरकारी विधि महाविद्यालयों के पास स्थाई मान्यता नहीं होने से हर साल तीन से छह माह की देरी से शैक्षणिक सत्र शुरू हो रहा हैं। जिससे प्रदेश में विधि की पढ़ाई करने के इच्छूक विद्यार्थी निजी महाविद्यालयों की ओर रुख कर रहे है। हर साल की तरह इस साल भी प्रवेश प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकी है।
इसलिए नहीं मिलती स्थाई मान्यता
प्रदेश के सरकारी विधि महाविद्यालयों को स्थाई मान्यता के लिए बीसीआई के मापदंड पूरे करने है। हालांकि हर साल देरी से ही सही लेकिन बीसीआई मान्यता तो देती है लेकिन तब तक करीब आधा सत्र गुजर जाता है। यह मान्यता अस्थाई होती है। स्थाई मान्यता नहीं होने के कारण हर साल महाविद्यालयों को और कॉलेज आयुक्तालय को मान्यता के लिए फिर से उसी प्रक्रिया से गुजरना होता है जिससे वह कई सालों से गुजर रहे है। नियमों के अनुसार सरकारी लाॅ काॅलेज में शिक्षकाें की कमी है। हालत ये हैं कि यहां एक शिक्षक के जिम्मे करीब 100 विद्यार्थी हैं जबकि बीसीआई के नियम कहते है कि 40 विद्यार्थियाें पर एक शिक्षक हाेना जरूरी है। वहीं स्थाई प्राचार्य भी नहीं मिल पाए हैं और संसाधनाें की कमी भी स्थायी मान्यता के लिए राेड़ा बनी हुई हैं। संसाधनों की कमियां पूरा करने के लिए कॉलेज आयुक्तालय बीसीआई को अंडर टेकिंग देती हैं। लेकिन हर साल फिर वहीं नौबत आ जाती है। महाविद्यालयों में खेल मैदान, परिसर में पर्याप्त कमरे, कम्प्यूटर लेब, स्थाई प्राचार्य, सह शैक्षिक स्टाफ, खेल प्रशिक्षक की कमी यथावत बनी हुई है।