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संयुक्त राष्ट्र विफल, नया शांति संगठन जरूरी

अमरीका तो संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों की परवाह ही नहीं करता है और अपने फायदे के लिए गलत तथ्यों को परोसकर और दुनिया को गुमराह कर संप्रभु राष्ट्रों पर हमले करता रहा है।

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डॉ.एन.एम.सिंघवी, पूर्व अध्यक्ष,प्रशासनिक सुधार, मानव संसाधन विकास एवं जनशक्ति नियोजन समिति,राजस्थान-प्रथम विश्व युद्ध के बाद युद्धमुक्त विश्व की संकल्पना के साथ लीग ऑफ नेशंस का जन्म हुआ था, किंतु इस संस्था में कई खामियां और त्रुटियां थीं। इसके संस्थापकों ने इसके लोकतंत्रीकरण के विचार को पूरी तरह नजरअंदाज किया। लीग का गठन केवल प्रथम विश्व युद्ध के विजेताओं की मनमानी इच्छा पर आधारित था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जिस संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई, वह भी उन्हीं पुराने दोषों से ग्रस्त रही। इसके मुख्य अंग सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी सदस्य वे देश बने, जो दूसरे विश्व युद्ध में विजेता पक्ष थे। इन सदस्यों को वीटो (निषेधाधिकार) की शक्ति दी गई, जिसने संयुक्त राष्ट्र को एक निष्प्रभावी संस्था बनाकर छोड़ दिया।

सैद्धांतिक रूप से संयुक्त राष्ट्र को दो देशों के बीच किसी भी विवाद को सुलझाने में सक्षम होना चाहिए, परंतु इसकी संरचना में लोकतंत्र का अभाव है। इन पांच स्थायी सदस्यों में से रूस और चीन साम्यवादी गुट के हैं, जबकि शेष तीन दूसरे खेमे में। दुनिया में कहीं भी युद्ध छिड़ता है, तो उसका नेतृत्व प्राय: इन्हीं दो गुटों में से कोई एक कर रहा होता है। जैसे ही युद्ध शुरू होता है, सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाई जाती है, लेकिन कोई न कोई स्थायी सदस्य वीटो का प्रयोग कर देता है और युद्ध रोकने की प्रक्रिया ठप हो जाती है। परिणामस्वरूप युद्ध को रोका नहीं जा सकता। वास्तव में, इन देशों को हासिल वीटो की यह सुविधा ही विश्व शांति के मार्ग का सबसे बड़ा रोड़ा और युद्धों का मुख्य कारण है। ये वीटो शक्ति संपन्न देश ही हथियारों के सबसे बड़े निर्माता और विक्रेता हैं। अपने युद्धक हथियारों की बिक्री बढ़ाने के लिए ये देश न केवल युद्ध भड़काते हैं, बल्कि रणनीतिक चालें भी चलते हैं। संयुक्त राष्ट्र के पास अपनी कोई सैन्य शक्ति नहीं है, वह सदस्य देशों की सेनाओं पर निर्भर है। जब भी शांति सेना की आवश्यकता होती है, तो अन्य देशों से प्रतिनियुक्ति पर सैनिक बुलाए जाते हैं।

अमरीका तो संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों की परवाह ही नहीं करता है और अपने फायदे के लिए गलत तथ्यों को परोसकर और दुनिया को गुमराह कर संप्रभु राष्ट्रों पर हमले करता रहा है। सद्दाम हुसैन और गद्दाफी के खिलाफ भी उसने भ्रामक बयानबाजी कर विश्व को गुमराह किया था। जब से ट्रंप ने पद संभाला, तब से शेष विश्व के प्रति उसका आक्रामक रवैया और बढ़ गया है।इन परिस्थितियों में संयुक्त राष्ट्र संघ को भंग करना अनिवार्य हो गया है। इसके स्थान पर भारत जैसे शांतिप्रिय देश के नेतृत्व में विश्व शांति संगठन का गठन समय की मांग है। इस नए संगठन का ढांचा पूर्णत: लोकतांत्रिक होना चाहिए, जिसमें प्रत्येक सदस्य देश को उसकी जनसंख्या के अनुपात में मतदान का अधिकार मिले- ठीक उसी तरह जैसे भारत में राष्ट्रपति चुनाव के लिए कॉलेजियम प्रणाली कार्य करती है। प्रस्तावित नए ढांचे में विश्व शांति संगठन की अपनी स्थायी सेना होनी चाहिए। प्रत्येक सदस्य राष्ट्र अपनी जनसंख्या के अनुपात में संगठन के बजट और सैन्य बल में योगदान दे। भर्ती किए गए सैनिकों को उनके गृह देश में तैनात न कर अन्य देशों में नियुक्त किया जाए और उनकी सेवाएं स्थानांतरणीय हों। वे केवल निर्वाचित संगठन के आदेशों का पालन करें। नए मुख्यालय पर धन व्यय करने के बजाय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बैठकें और चुनाव संपन्न हों। इस नए ढांचे पर दुनियाभर के अकादमिक जगत और प्रत्येक देश की राजकाज की संस्थाओं में व्यापक चर्चा होनी चाहिए। उनकी मंजूरी और बहुमूल्य सुझावों को शामिल करने के बाद ही विश्व शांति संगठन अस्तित्व में आए। महाशक्तियों की विस्तारवादी सनक को रोकने और वैश्विक संसाधनों की सुरक्षा के लिए इस नए संगठन की स्थापना अब अपरिहार्य है।