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रेतीली धरती पर खेती की पारंपरिक चुनौतियों को तकनीक के माध्यम से सुगम बनाने की दिशा में जयपुर के कृषि वैज्ञानिकों ने एक ऐतिहासिक सफलता अर्जित की है। केंद्र सरकार द्वारा देश में मोटे अनाज यानी 'श्री अन्न' (मिलेट्स) के उत्पादन और खपत को बढ़ाने के लिए चलाए जा रहे व्यापक राष्ट्रीय अभियान के अंतर्गत जयपुर स्थित राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान (RARI) ने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। रारी (RARI) के वैज्ञानिकों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित संस्थान इक्रीसेंट (ICRISAT) के साथ मिलकर बाजरे की एक ऐसी अनूठी और उन्नत हाइब्रिड किस्म विकसित की है, जो अत्यधिक कम बारिश वाले और सूखे की मार झेलने वाले क्षेत्रों में भी किसानों को बंपर पैदावार दे सकती है।
इस नई क्रांतिकारी किस्म को वैज्ञानिक तकनीकी भाषा में देश की पहली 'थ्री-वे हाइब्रिड' (Three-Way Hybrid) बाजरा किस्म का नाम दिया गया है, जिसका आधिकारिक पंजीकरण नंबर 'RHB-273' तय किया गया है। भारत सरकार के केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने इस वर्ष देश के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए कुल 184 उन्नत और उच्च गुणवत्ता वाली फसल किस्मों को अधिसूचित और जारी किया है।
खास बात यह है कि जयपुर के वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गई इस 'RHB-273' बाजरा किस्म को भी केंद्र सरकार ने इन 184 विशिष्ट किस्मों की सूची में प्रमुखता से स्थान दिया है। यह किस्म आने वाले समय में विशेष रूप से राजस्थान के बाजरा उत्पादक बेल्ट के कृषि ढांचे में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव लाने की क्षमता रखती है।
आम तौर पर बाजार में मिलने वाले सामान्य हाइब्रिड बीज सिंगल-क्रॉस या डबल-क्रॉस पद्धतियों पर आधारित होते हैं, लेकिन 'RHB-273' को विकसित करने के लिए वैज्ञानिकों ने जिस 'थ्री-वे हाइब्रिड' (Three-Way Hybrid) तकनीक का उपयोग किया है, वह बेहद जटिल और उच्च कोटि की आनुवंशिक शोध प्रक्रिया है। इस जेनेटिक तकनीक के तहत बाजरे के अंतिम बीज को तैयार करने के लिए 3 अलग-अलग शुद्ध और चुनिंदा किस्मों (Inbred Lines) का एक व्यवस्थित क्रम में समागम (Cross) कराया जाता है।
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, इस प्रक्रिया के प्रथम चरण में बाजरे की 2 अत्यधिक शुद्ध और उत्कृष्ट आनुवंशिक गुणों वाली पारंपरिक किस्मों के बीच आपस में क्रॉस करवाकर एक शुरुआती हाइब्रिड (Single-Cross Hybrid) पौधा तैयार किया जाता है। इसके पश्चात, द्वितीय चरण में इस नव-विकसित शुरुआती हाइब्रिड पौधे का क्रॉस बाजरे की ही एक तीसरी विशिष्ट और अत्यंत मजबूत इनब्रेड लाइन (Third Line) के साथ कराया जाता है। इस दोहरे क्रॉस के बाद जो अंतिम बीज प्राप्त होता है, उसे ही 'थ्री-वे हाइब्रिड' बीज कहा जाता है। इस वैज्ञानिक पद्धति का सबसे बड़ा तकनीकी लाभ यह होता है कि अंतिम बीज के भीतर तीनों अलग-अलग मूल किस्मों की सबसे बेहतरीन खूबियां, जैसे कि बीमारियों से लड़ने की क्षमता, तने की मजबूती और दानों का बड़ा आकार, एक साथ समाहित हो जाती हैं।
जयपुर के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई बाजरे की इस नई किस्म 'RHB-273' की कई ऐसी अनूठी तकनीकी और व्यावहारिक विशेषताएं हैं, जो इसे बाजार में उपलब्ध अन्य पारंपरिक और हाइब्रिड बीजों की तुलना में काफी आगे खड़ा करती हैं। किसानों के दृष्टिकोण से इसकी प्रमुख खूबियों को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है:
खेती-किसानी में किसी भी नई किस्म की सफलता का असली पैमाना उसकी प्रति हेक्टेयर उत्पादकता से तय होता है। इस मामले में भी 'RHB-273' ने परीक्षणों के दौरान बेहद शानदार और उत्साहजनक परिणाम प्रदर्शित किए हैं। विस्तृत कृषि वैज्ञानिक परीक्षणों के आंकड़ों के अनुसार, इस थ्री-वे हाइब्रिड किस्म के माध्यम से किसानों को प्रति हेक्टेयर औसतन 23 क्विंटल (23 Quintals) उच्च गुणवत्ता वाले साफ और मोटे बाजरे के दानों का शुद्ध उत्पादन प्राप्त होता है। इसके दानों का आकार बड़ा और रंग चमकीला होता है, जिससे किसानों को स्थानीय कृषि मंडियों में इसका बहुत अच्छा बाजार भाव भी मिलेगा।
इसके अतिरिक्त, राजस्थान की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि के साथ-साथ पशुपालन (Animal Husbandry) एक बहुत बड़ा मुख्य आधार है। सूखी और रेतीली भूमि होने के कारण यहां साल भर मवेशियों के लिए हरे और सूखे चारे का गंभीर संकट बना रहता है। इस समस्या के व्यावहारिक समाधान के रूप में 'RHB-273' बाजरे की फसल से दानों की कटाई के बाद प्रति हेक्टेयर औसतन 48 क्विंटल (48 Quintals) पौष्टिक और स्वादिष्ट सूखा चारा (कड़बी) भी प्राप्त होता है। यह चारा मवेशियों के स्वास्थ्य और उनके दुग्ध उत्पादन को बढ़ाने के लिए बेहद उत्तम माना गया है। इस प्रकार यह किस्म किसानों को दोहरा आर्थिक लाभ प्रदान करती है।
जयपुर के राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान (RARI) के निदेशक डॉ. सुरेंद्र सिंह ने इस उपलब्धि पर तकनीकी जानकारी साझा करते हुए बताया कि केंद्र सरकार की सर्वोच्च किस्म मूल्यांकन समिति ने 'RHB-273' को देश के विशिष्ट 'ए जोन' (A Zone) के तहत व्यावसायिक खेती के लिए अपनी आधिकारिक स्वीकृति और मंजूरी प्रदान कर दी है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के नियमों के अनुसार, 'ए जोन' के अंतर्गत देश के वे भौगोलिक क्षेत्र आते हैं जहां वर्षा का पैटर्न कम या मध्यम होता है और जहां की मिट्टी मुख्य रूप से रेतीली या बलुई दोमट होती है।
इस राष्ट्रीय स्वीकृति के मिलने से अब इस वैरायटी का लाभ केवल जयपुर या राजस्थान तक ही सीमित नहीं रहेगा। राजस्थान के देश में सबसे बड़े बाजरा उत्पादक राज्य होने के कारण यहाँ के पश्चिमी और पूर्वी जिलों को तो इसका सीधा फायदा मिलेगा ही, साथ ही इसके समानांतर चलते हुए देश के 6 अन्य प्रमुख राज्यों- हरियाणा, गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली और पंजाब के अर्ध-शुष्क और कम सिंचाई वाले मैदानी इलाकों के किसानों को भी इस खरीफ सीजन से इस बीज का बड़ा लाभ मिलना शुरू हो जाएगा।
Updated on:
31 May 2026, 11:47 AM IST
Published on:
31 May 2026, 11:47 AM IST
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