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यह जिंदगी आपकी है, इसकी कहानी भी खुद ही लिखें

आधी आबादी यानी महिलाओं की सोच को अखबार में उतारने के लिए पत्रिका की पहल संडे वुमन गेस्ट एडिटर के तहत आज की गेस्ट एडिटर अस्मा खान हैं। आप लंदन के प्रसिद्ध दार्जिलिंग एक्सप्रेस रेस्त्रां की फाउंडर, ब्रिटिश-भारतीय मूल की शेफ और कुकबुक लेखिका हैं। आप संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम की शेफ एडवोकेट भी हैं। वोग की 25 सबसे प्रभावशाली महिलाओं में शामिल होने वालीं पहली शेफ हैं।

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Women Guest Editor

यह जिंदगी आपकी है, इसकी कहानी भी खुद ही लिखें

आधी आबादी यानी महिलाओं की सोच को अखबार में उतारने के लिए पत्रिका की पहल संडे वुमन गेस्ट एडिटर के तहत आज की गेस्ट एडिटर अस्मा खान हैं। आप लंदन के प्रसिद्ध दार्जिलिंग एक्सप्रेस रेस्त्रां की फाउंडर, ब्रिटिश-भारतीय मूल की शेफ और कुकबुक लेखिका हैं। आप संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम की शेफ एडवोकेट भी हैं। वोग की 25 सबसे प्रभावशाली महिलाओं में शामिल होने वालीं पहली शेफ हैं।

हाल में आपको इंडिया-यूके अचीवर्स अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। आप मानती हैं कि महिलाओं के पास वह शक्ति है जिससे वे दुनिया बदल सकती हैं। बस अपने अंदर के डर को बाहर निकालें और उन बाधाओं को दूर करें जो आपको रोके हुए हैं। क्योंकि आपके ऊपर बहुत सारे प्रतिबंध आपके मन में ही हैं। यह जिंदगी आपकी है, इसकी कहानी भी खुद ही लिखें। थोड़ा खुद के लिए भी कुछ करें।

दक्षा वैदकर
भोपाल. एक तरफ जहां लोग रिटायरमेंट के बाद आराम की जिंदगी गुजारना पसंद करते हैं, वहीं प्रज्ञा औरंगाबादकर ने बिना देरी किए खुद का व्यवसाय शुरू किया, जो साल-दर-साल बढ़ रहा है। इस व्यवसाय के जरिए वे न केवल खुद को आगे बढ़ा रही हैं, बल्कि अपने साथ ही अन्य लोगों को भी रोजगार दे रही हैं। बता दें कि प्रज्ञा जून, 2015 में सचिवालय में महिला एवं बाल विकास विभाग में अंडर सेक्रेटरी पद से सेवानिवृत्त हुई थीं।

नेहा सेन
जबलपुर। रेणुका मालेगांवकर के बनाए पारम्परिक व्यंजनों की मांग विदेशों तक हैं। उन्होंने अपने किचन से इसकी शुरुआत करीब 15 साल पहले की थी। अब उनका यह बिजनेस केटरिंग तक पहुंच चुका है। रेणुका कहती हैं कि किसी भी सफलता का सफर आसान नहीं होता। इसके लिए काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। शुरुआती दिनों में काफी कम ऑर्डर मिलते थे। कई डिश ऐसी होती थीं, जिसमें सूखे मेवे और शुद्ध घी का इस्तेमाल करना पड़ता था। इसके एवज में पैसा कम मिलता था। पर कस्टमर्स को क्वालिटी चीजें मिले इसलिए घाटा भी सहा। उनके बनाए कई उत्पाद विदेश में लोग ले जाते हैं। मगज लड्डू, मोदक और चाकोली अधिक डिमांड में होते हैं।

जयकुमार भाटी
जोधपुर। पूजा, जिन्होंने फूड बिजनेस करने के लिए आइटी कंपनी की नौकरी तक छोड़ दी। क्योंकि बिजनेस माइंड उन्हें अपने पिता से मिला। अपने व्यापारी पापा से प्रेरित होकर ही उन्होंने खुद का बिजनेस करने का सोचा। जब पूजा ने चीजकेक बिजनेस करने के बारे में सोचा तब उन्हें इसके बारे में बिल्कुल जानकारी नहीं थी। सोशल मीडिया से चीजकेक बनाना सीखा। एक महीने तक प्रेक्टिस की। परिवार-रिश्तेदारों से इसको लेकर बातें भी सुननी पड़ीं।

सरिता दुबे
रायपुर। यहां महाराष्ट्र मंडल ने सैकड़ों महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है। मंडल की व्यंजन शाखा की कमान जामबाई ने संभाली हुई है। वे कहती हैं कि यहां रोजाना एक हजार लोगों का भोजन तैयार किया जाता है। यहां के भोजन में लोगों को मां के हाथ से बने व्यंजनों का स्वाद आता है। वे इनका जायका लेने के बाद तारीफ किए बगैर नहीं रहते हैं। उन्होंने बताया कि पहले यहां कम महिलाएं काम करती थीं लेकिन जब हमारे बनाए व्यजंन लोगों को पसंद आने लगे तो हम लोगों ने कई महिलाओं को अपने साथ जोड़ा। अब स्थिति यह है कि हम पूरे साल व्यंजन बनाते है। बस त्यौहार विशेष पर आर्डर ज्यादा रहते हैं। महिलाओं को रोजगार मिलने से वे आत्मनिर्भर हुई हैं। उनमें आत्मविश्वास पैदा हुआ है।