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तीन दिवसीय राष्ट्रीय किसान एवं गोपालक सम्मेलन में राज्यपाल ने कहा “मनुष्य के पोषण का बड़ा आधार गोमाता”

इंडियन एयरफोर्स में 23 साल देश की सेवा की है। क्योंकि हमारे दादाजी की परंपरा है, कि देश की सेवा करना जरूरी है। इसके बाद में भी मेरे मन में हमेशा से पर्यावरण के लिए कुछ करने की सोच थी।

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भारत भूमि अन्नपूर्णा है। फसल की वृद्धि और उससे उत्पादन लेने के लिए जो तत्व चाहिए वे सब भूमि में मौजूद हैं। गाय के गोबर को खाद के रूप में उपयोग कर रसायन मुक्त कृषि पद्धति को अपनाना होगा। मनुष्य के पोषण का बड़ा आधार गोमाता है। यह उदबोधन सांगानेर स्थित पिंजरापोल गोशाला के सुरभि भवन में अखिल भारतीय गोशाला सहयोग परिषद् की ओर से तीन दिवसीय राष्ट्रीय किसान एवं गोपालक सम्मेलन के शुभारंभ पर राज्यपाल हरिभाऊ किशनराव बागड़े ने दिए। इस दौरान दीप प्रज्जवलन और गोसेवा से कार्यक्रम की शुरुआत हुई। गो आधारित उत्पादों और कृषि की नई तकनीकों पर विशेष फोकस किया। देशभर से आए किसानों ने नई तकनीक को समझा।  उत्पादों और प्राकृतिक कृषि से संबंधित लाइव डेमो सेशन दिए गए।

यह रहे आकर्षण का केंद्र


परिषद के अंतरराष्ट्रीय संयोजक डॉ. अतुल गुप्ता ने कहा कि गोबर से बने जैविक खाद, गोमूत्र से बने प्राकृतिक कीटनाशक और अन्य गो आधारित उत्पादों की प्रदर्शनी आकर्षण का केंद्र रहे। सम्मेलन का उद्देश्य किसानों को गो आधारित कृषि प्रणाली की महत्ता और लाभों के बारे में जागरूक करना है। विशेषज्ञों ने गो आधारित प्राकृतिक खेती के तरीकों को अपनाने पर जोर दिया। कृषि मंत्री किरोड़ीलाल मीणा ने कहा कि किसानों को नई तकनीक सीखने के साथ किसानी व गोधन को बचाते हुए उसके प्रोडक्ट्स को बनाने पर एक-दूसरे से नुस्खे साझा करें।

मोनिका गुप्ता ने बताया कि सम्मेलन में विशेष आकर्षण गोमय नवग्रह समिधा लांच हुआ। समिधा का उपयोग राशि के अनुसार हवन के लिए किया राज्यपाल ने अंत में विभिन्न स्टॉल्स का अवलोकन भी किया। जोबनेर कृषि विश्वविद्यालय के प्रो. बलराज सिंह ने भी विचार रखें। अतिथियों ने देशी गाय के उपलब्ध दूध को महत्वपूर्ण बताया। गो धन संरक्षण के लिए गोशालाओं और अन्य किए जा रहे कार्यों की सराहना भी की।

साझा की सफलता की कहानी, लाखों रुपए का पैकेज छोड़कर शुरू किए स्टार्टअप

जयपुर. मैं एक बहुत छोटी जगह से आई हूं। इंडियन एयरफोर्स में 23 साल देश की सेवा की है। क्योंकि हमारे दादाजी की परंपरा है, कि देश की सेवा करना जरूरी है। इसके बाद में भी मेरे मन में हमेशा से पर्यावरण के लिए कुछ करने की सोच थी। वर्षों फोर्स में रहने के बाद पर्यावरण के लिए काम करना शुरू किया और आज हम अलग-अलग पद्दति से खेती और पर्यावरण के लिए काम कर रहे हैं। ये कहानी है रंजनी अय्यर की, जिन्होंने पिंजरापोल गोशाला में चल रहे नेशनल मेले व राष्ट्रीय गो आधारित प्राकृतिक किसान सम्मेलन में अपनी सफलता के अनुभव साझा किए। उनके साथ ही अन्य कई सफल महिला—पुरुषों ने अपनी कहानी बताते हुए खेती व पर्यावरण को सुरक्षित रखने के बारे में बताया। उन्होंने गोधन को भी जरूरी बताया। इसमें किसी ने लाखों का पैकेज छोड़कर तो किसी ने कड़ा संघर्ष करके सफलता हासिल की।

गौरतलब है कि मेले में सजी 100 स्टॉल्स में दूसरे दिन गुरुवार को बड़ी संख्या में किसानों और विशेषज्ञों ने विजिट की। अखिल भारतीय गोशाला सहयोग परिषद् की ओर से आयोजित कार्यक्रम में परिषद के अंतरराष्ट्रीय संयोजक डॉ. अतुल गुप्ता ने बताया कि किसान आयोग अध्यक्ष सी.आर. चौधरी, अहमदाबाद से गोपाल भाई, लोकमय राम छत्तीसगढ़ संस्था से नागेंद्र दूबे, प्रचारक जयपुर प्रांत आरएसएस बाबू लाल और मोहन कुमार, विश्व हिंदू परिषद से राजाराम, बीजेपी से डॉ. विक्रम सिंह, मोनिका गुप्ता, संगीता गौड़, लक्ष्मण लोहाना, अतुल व्यास सहित अन्य लोग शामिल हुए।

आज हमारे खते हैं हरे-भरे


मैं टीबा की धरती झुंझुनू से हूं। हमें कहा गया था कि 20 साल तक भी जमीन पर कुछ नहीं उगेगा। हमने हिम्मत नहीं हारी और आज हमारे खेत हरे-भरे हैं। इसमें भी सिर्फ हम दो ही लोग ही हैं, जो खेती कर रहे हैं। ये कहानी है बंजर जमीन को हराभरा करने वाले रामेश्वर का। उन्होंने कहा कि पुराना तरीका गोबर से खेती करने का है। वहीं हम बायोडाजेस्ट से खेती कर रहे हैं, जिसमें खर्चा कम है और हर तरह की फसल तैयार की जा सकती है। ये पद्दति हम युवा किसानों को भी बता रहे हैं।

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