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लौकिक न्यायों के प्रयोग से शास्त्रबोध सहज होता है – प्रो. अर्कनाथ चौधरी

व्याकरण शास्त्र में लौकिक न्यायों के उपयोग पर द्विदिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन

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जयपुर

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Rakhi Hajela

Mar 27, 2023

लौकिक न्यायों के प्रयोग से शास्त्रबोध सहज होता है - प्रो. अर्कनाथ चौधरी

लौकिक न्यायों के प्रयोग से शास्त्रबोध सहज होता है - प्रो. अर्कनाथ चौधरी

जयपुर । सभी भारतीय शास्त्रों में लौकिक न्यायों का प्रयोग हुआ है । गंभीर विषय को सहजता से प्रतिपादित करने के लिए शास्त्रकार लौकिक न्यायों और दृष्टान्तों का प्रयोग करते हैं । भारतीय शास्त्र परम्परा का लोक के साथ निरन्तर संवाद रहा है । यह विचार केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के जयपुर परिसर में व्याकरण शास्त्र में लौकिक न्यायों के उपयोग पर आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रो. अर्कनाथ चौधरी ने मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किए । वैदिक एवं लौकिक मंगल के पश्चात् जयपुर परिसर के निदेशक प्रो. सुदेश कुमार शर्मा ने विद्वान् अतिथियों का शाल श्रीफल आदि से स्वागत किया । स्वागत वक्तव्य व्याकरणशास्त्र विद्याशाखा के प्रमुख प्रो. शिवकान्त झा ने दिया ।

सम्मेलन का विषय प्रवर्तन करते हुए प्रो. कमलचन्द्र योगी ने वेद, रामायण और महाभारत में प्रयुक्त लौकिक न्यायों का उल्लेख करते हुए व्याकरण शास्त्र में लौकिक न्यायों के उपयोग के औचित्य का निरूपण किया। सारस्वत अतिथि प्रो. श्रीकृष्ण शर्मा ने कहा कि यद्यपि अन्यान्य शास्त्रों में लौकिक न्यायों का उपयोग हुआ है तथापि महाभाष्य में जितनी सरलता और सुंदरता से लौकिक न्यायों का प्रयोग दिखाई देता है वैसा अन्यत्र दुर्लभ है । उन्होंने कूपखानक-न्याय, अभक्ष्यो ग्राम्यकुक्कुटः, आम्रसेकपितृतर्पण-न्याय, श्वेतो धावति, वृद्धकुमारीवर-न्याय आदि अनेक लौकिक न्यायों के महाभाष्य में प्रयोग पर अपने विचार व्यक्त किए ।विशिष्ट अतिथि प्रो. भगवती सुदेश ने न्याय शब्द की निरूक्ति बताते हुए कहा कि लौकिक न्याय से तात्पर्य लोक व्यवहार में प्रसिद्ध दृष्टान्तों से है । लौकिक न्यायों के प्रयोग का प्रयोजन शास्त्रीयविषयों को सरलता से बोधगम्य बनाना है। सभी शास्त्रों में लौकिक न्यायों का अनुप्रयोग हुआ है ।

बेंगलुरू कर्नाटक से अतिथि श्रीजनार्दन हेगड़े ने कहा कि यह प्रसन्नता का विषय है कि वर्तमान समय में भारतवर्ष में अनेक युवा संस्कृत शास्त्रों में पारंगत हो रहे हैं । सभाओं में संस्कृत भाषा में विषय प्रतिपादन करते समय भाषा शुद्धि पर विशेष आग्रह करते हुए उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा बोलते समय भाषाशुद्धि प्रयास साध्य न होकर स्वाभाविक होना चाहिए , इसलिए युवकों को विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए। मुख्य वक्ता प्रो. प्रदीप कुमार पाण्डेय ने व्याकरण शास्त्र में लौकिक न्यायों की संगति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि व्याकरण शास्त्र भाषा का नियमन करता है । भाषा लोक में प्रयुक्त होती है इसलिए व्याकरण शास्त्र की परम्परा में लौकिक न्यायों एवं दृष्टान्तों का बहुलता से प्रयोग हुआ है ।

अध्यक्षीय भाषण में जयपुर परिसर के निदेशक प्रो. सुदेश कुमार शर्मा ने कहा कि हमें विविध आयामों में आज के निकष पर लौकिक न्यायों का पुनः समीक्षण करना चाहिए । प्राच्य शास्त्रों में प्रयुक्त लौकिक न्याय पाश्चात्य परिस्थितियों में किस प्रकार से संगत हो सकते हैं यह विचारणीय है । ज्ञान,अनुसंधान और प्रयोग इन तीनों ही दृष्टि से लौकिक न्यायों का अध्ययन उपादेय है। उल्लेखनीय है कि इस द्विदिवसीय व्याकरण शोध सम्मेलन में देश के अनेक विश्वविद्यालयों एवं उच्च शिक्षण संस्थानों से प्रतिनिधि विद्वान् आए हैं जो व्याकरण में लौकिक न्यायों के विविध पक्षों पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत कर रहे हैं । कृतज्ञता ज्ञापन प्रो. श्रीधर मिश्र एवं संचालन प्रो. विष्णुकान्त पाण्डेय ने किया।