
कटाक्ष -लड़ाई का मनोविज्ञान
कटाक्ष
लड़ाई का मनोविज्ञान
श्याम गुप्ता 'शान्त'
देखो आज सुबह-सुबह तुम फिर मोबाइल में सिर डालकर बैठ गए! 'और तुम टीवी में घुस गई, जबकि रसोई में ढेर काम बिखरा पड़ा है।'
सुनीता उखड़ते हुए बोली-'रहने दो रवि, मैं तुम्हारे मुंह नहीं लगना चाहती।'
'तुम्हारे मुंह! इसका मतलब और भी कोई है तुम्हारे मुंह लगने के लिए।'
'बिल्कुल है, बताऊं क्या? बात शॉर्ट में काटो, वरना बात दूर तलक जाएगी।'
'दूर तलक, कितनी दूर तलक! तुम्हारे पीहर तक या मेरे ससुराल तक !'
'रवि पीहर तक पहुंचने की जरूरत नहीं है। उसका भी नंबर जल्दी आ जाएगा।'
'क्या मतलब, उसका नंबर! क्या तुम अपने पीहर में जाकर बैठ जाओगी? 'शर्म करो रवि! बच्चे बड़े हो रहे हैं।'
'बच्चों की आड़ लेकर मुझो इमोशनल ब्लैकमेल करना चाहती हो!'
'तुम्हें इमोशनल ब्लैकमेल की अगर इतनी ही फिक्र होती तो तुम अपनी सेके्रटरी से प्यार की पींगे नहीं बढ़ाते।'
'ओह हो! मैं प्यार की पींगे बढ़ाता या तुम अपने बॉस की बाहों में...'
'तुम महाभारत ही करना चाहते हो तो, मुझो भी सोचना पड़ेगा कि मैं इस रिलेशन को कब तक कंटीन्यू करूं!'
'तुम्हारा डाइवर्स का इरादा तो नहीं !'
'अरे रवि मैं इतनी पागल नहीं कि इतने सस्ते में तुमसे डाइवर्स ले लूं। मैं तो तुम्हारी छाती पर जमके मूंग दलूंगी।'
'मैं तो ये सोच रहा था कि आज तुम मुझो ये सरप्राइज जरूर दोगी!'
'तो फिर ठंडे दिमाग से सुनो तुम ये सरप्राइज- कल मेरे मम्मी पापा आ रहे हैं यहां। पूरे दो महीने के लिए। पापा की तबियत ठीक नहीं रहती है। यहां एम्स में तुम्हारी अच्छी-खासी पहचान है तो मैंने सोचा उसका फायदा उठाया जाए?
रवि मायूस होकर बोला-' मुझो भयंकर सिर-दर्द हो रहा है, जरा बढिय़ा सी चाय एक बार और बनाकर दे दो ना प्लीज!'
'ओह स्योर स्योर, क्यों नहीं। मैं अभी पांच मिनट में अदरक डालकर शानदार जायकेदार चाय बनाकर लाती हूं।'
और ये बात खत्म होते- होते वहां के बोझिाल माहौल में मनमोहक-सी ठंडक घुल गई।
Published on:
22 Nov 2020 01:54 pm
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