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राजस्थान में शीतलाष्टमी पर गधे की भी होती है पूजा, जानिए क्यों

मेहनती जानवर होने के बावजूद गधे को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता, लेकिन राजस्थान में साल में एक दिन गधे की पूजा भी होती है।

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जयपुर

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Suresh Vyas

Mar 10, 2018

Donkey Worship

Donkey Worship

जयपुर। राजस्थान को 'रंग रंगीलो' ऐसे ही नहीं कहा जाता। यहां की अप्रतिम संस्कृति में जानवरों के प्रति भी सम्मान दर्शाने की परम्परा है। यही कारण है कि यहां गधे की भी साल में एक दिन पूजा की जाती है।

सुनने में यह भले ही अजीब लगे, लेकिन यह हकीकत है। होली के आठ दिन बाद मनाए जाने वाले लोक पर्व शीतलाष्टमी पर महिलाएं बाकायदा गधे की पूजा करती है। इसके बाद ही एक दिन पहले बनाया गया बासी भोजन ग्रहण किया जाता है। स्थानीय भाषा में शीतलाष्टमी को 'बास्योड़ा' भी कहा जाता है। इस दिन प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में लोग गर्म वस्तुओं का सेवन नहीं करते। इस परम्परा के पीछे वैज्ञानिक कारण भी है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में यह लोकपर्व देवी के एक अवतार शीतला माता के प्रति आस्था प्रकट करने का अहम मौका है। गधे को शीतला माता का वाहन माना गया है। यह भी शीतलाष्टमी पर गधे की पूजा का एक कारण माना जाता है।

बीकानेर में गधे की पूजा शीतलाष्टमी का विशेष आकर्षण है। यहां महिलाएं शीतला माता मंदिर में ठंडे भोजन का भोग लगाने के बाद गधे की पूजा करती है। इसके बाद घर लौटकर बासी भोजन का सेवन किया जाता है। गधे की पूजा के लिए एक किवदंती है। इसके अनुसार शीतला माता यह पता लगाने के लिए पृथ्वी लोक में आई कि लोग उनके प्रति कैसी आस्था रखते हैं। जयपुर जिले की चाकसू तहसील के डूंगरी गांव में पहुंची तो देखा कि न तो वहां उनका मंदिर है और न ही कोई पूजा करता है।

शीतला माता गांव में घूम रही थी इसी दौरान एक मकान के ऊपर से किसी ने चावल का उबला पानी (मांड) फेंका। इससे शीतला माता झुलस गई। उनके शरीर पर फफोले पड़ गए। वे चीखी-चिल्लाई, लेकिन किसी ने मदद नहीं की। उसी वक्त अपने घर के बाहर बैठी एक कुम्हारन ने शीतला माता पर ठंडा पानी डाला। इससे थोड़ी राहत मिली तो उस वृद्धा ने शीतला माता को बासी राब व दही खाने को दिया। इससे भी शीतला माता के शरीर को ठंडक मिली। फिर कुम्हारन शीतला माता के बाल संवारने लगी तो उसे बालों के नीचे एक आंख छिपी हुई दिखी। कुम्हारन घबराकर भागने लगी। इस पर देवी अपने असली रूप में आ गई। कुम्हारन ने शीतला माता को प्रणाम करते हुए कहा कि उनके घर में तो उन्हें बिठाने के लिए आसन व चौकी तक नहीं है। कुम्हारन के भक्तिभाव से प्रभावित हुई शीतला माता घर के बाहर खड़े गधे पर बैठ गई। माता ने कुम्हारन को वरदान मांगने को कहा। कुम्हारन ने इसी गांव में स्थापित होकर रहने व उसकी तरह शीतलाष्टमी पर पूजा अर्चना करने वालों की दरिद्रता दूर करने का वरदान मांगा। शीतला माता ने वरदान देते हुए कहा कि आज से उनकी पूजा का मुख्य अधिकार कुम्हार जाति का ही होगा। शीतला माता डूंगरी में स्थापित हो गई। तभी से गांव का नाम शील की डूंगरी पड़ गया। यह देश का प्रमुख शीतला माता मंदिर है। यहां शीतलाष्टमी पर भरने वाले मेले में लाखों लोग पहुंचते हैं।

शीतला माता ने चूंकि गधे को अपना वाहन बनाया। उनकी गर्धवरोही प्रतिमा का ही पूजन होता है। कई लोग मन्नत पूरी होने पर मंदिर में गधे की कपड़े से बनी प्रतिकृति भी चढ़ाते हैं, लेकिन बीकानेर में तो प्रत्यक्ष रूप से गधे की पूजा भी की जाती है।