जयपुर। मैं विश्व साइकिल दिवस (world bicycle day) की पूर्व संध्या विश्व विरासत परकोटे (Walled City jaipur) में साइकिल लेकर निकला। साइकिल की सवारी (Ride of cycle) करना यहां आसान नहीं था। मुख्य सडक़ों (Main roads) पर बड़े वाहनों की रेलमपेल थी और गलियों में साइकिल से निकलना किसी मुसीबत से कम नहीं लगा। साइकिल को बढ़ावा देने की बातें तो खूब हो रही हैं, लेकिन शुक्रवार को जब मैंने यहां की गलियो में से लेकर प्रमुख बाजारों में करीब आठ किमी तक साइकिल चलाई तो समझ में आया कि साइकिल का सफर शहर में तो आसान नहीं है। ऑटो वाले बोले: ओए साइकिल साइड में ले ले। ई-रिक्शा वालों ने कहा कि ये कोई समय है क्या साइकिल चलाने का।
मेरा दर्द न समझे कोई…
मैं साइकिल हूं। जब मोटरसाइकिल और कार नहीं होती थी, तब मेरी अलग पहचान थी। आज शहर की सडक़ों पर मेरे लिए जगह ही नहीं बची है। मैं चलूं कहां? बड़ी-बड़ी गाडिय़ों के बीच निकलने में डर लगता है। दम घोंटू हॉर्न मुझे पसंद नहीं हैं। मैं मानती हूं कि मैं कार और मोटरसाइकिल जितनी तेज नहीं चल सकती, लेकिन मेरे लिए सुगम रास्ता बनाने की जिम्मेदारी जिन विभागों की थी, उन्होंने तो मेरे लिए कुछ नहीं किया।