ना केवल देश बल्कि पूरे विश्व में आज विश्व पुस्तक दिवस मनाया जा रहा है। इस वर्ष इस दिन की थीम स्वदेशी भाषाएं रखी गई हैं। हमारा देश विविधताओं से भरा हुआ है, हर प्रांत की अपनी बोली है और अपनी संस्कृति। सभी जगह का साहित्य भी बेहद समृद्ध है। संविधान की आठवीं अनुसूची में 24 भाषाएं शामिल हैं, वो सभी स्वदेशी भाषाएं हैं। राजस्थान की बात करें तो यहां से गौरवशाली इतिहास का साहित्य राजस्थानी भाषा में लिखा हुआ है लेकिन साहित्य, इतिहास, शब्दकोश, लिपि और करीब 9 करोड़ लोगों की ओर से सामान्य बोलचाल में बोली जाने वाली स्वदेशी भाषा राजस्थानी आज भी भाषा की मान्यता की बाट जोह रही है। सालों से राजस्थानी भाषा को मान्यता दिए जाने की मांग की जा रही है लेकिन यह आज तक पूरी नहीं हो पाई है।
यह भी पढ़ें – World Book Day- नॅान फिक्शन बुक्स का बढ़ रहा क्रेज, जीवन में काम आने वाली किताबों की तलाश
स्वदेशी भाषाओं को संरक्षित किए जाने की जरूरत- मुक्ता अग्रवाल
महारानी कॉलेज की प्राचार्य मुक्ता अग्रवाल का कहना है कि स्वदेशी भाषाओं को संरक्षित किए जाने की जरूरत है क्योंकि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत को विश्व पटल पर पहुंचाने, समृद्ध करने में मदद करती हैं। ऐसे में जरूरी है कि विरासत से जुड़े विषय फिर वह सांस्कृतिक धरोहर हो या हमारे सांस्कृतिक, लोककला की जानकारी स्वदेशी भाषाओं में उपलब्ध होनी चाहिए। इन्हें स्कूल, कॉलेजों के साथ ही परिवार के स्तर पर इनकी जानकारी भी प्राथमिकता के आधार पर दी जानी चाहिए। हम अपने बच्चों को अंग्रेजी सिखाने पर जोर देते हैं उसी प्रकार अपनी क्षेत्रीय भाषाओं को भी प्राथमिकता दिए जाने की जरूरत है। नई शिक्षा नीति में उसमें भी राष्ट्र भाषा में शिक्षण पर जोर दिया गया है लेकिन ऐसा हम तभी कर पाएंगे जबकि क्षेत्रीय या स्वदेशी भाषा में लिटरेचर उपलब्ध होगा। हम राजस्थानी भाषा की बात करते हैं लेकिन इसमें साहित्य हमारे पास बेहद कम है।
यह भी पढ़ें – World Book Day Today- किताब पढऩे से आती है सकारात्मकता डिप्रेशन को कम करने में भी सहायक
राजस्थान में स्वदेशी भाषाएं हैं और इनका विपुल साहित्य – प्रोफेसर विशाल विक्रम सिंह
राजस्थान यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर विशाल विक्रम सिंह ने बताया कि राजस्थान की बात करें तो यहां का भूगोल इतना बड़ा है कि यूरोप के कई देश इससे छोटे हैं। यहां अलग-अलग क्षेत्र में कहीं मारवाड़ी, कहीं ढूंढाड़ी तो कहीं शेखावाटी बोली जाती है। ये यहां की स्वदेशी भाषाएं हैं और इनका विपुल साहित्य है। आज से नहीं बल्कि जब से भारत का लिखित इतिहास मिलता है, तभी से यहां का इतिहास मिलता है। पृथ्वीराज रासो, ढोला मारू जैसी अद्भुत रचना लिखी गई, भक्ति आंदोलन के कई कवियों पर ढोला मारू का काफी असर भी रहा। उन्होंने कहा कि खास अवसरों पर जब सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का उद्गार करना होता है, तो लोग अपने ही लेखकों की रचनाओं को याद करते हैं, वो उनके जुबान पर चढ़ी होती है। उन्होंने कहा कि राजस्थान की बोली को भाषा के तौर पर देखा जाना चाहिए क्योंकि उनके नजरिए में बोली और भाषा में अंतर नहीं है। जो अंतर है वो भाषा वैज्ञानिकों, राजनैतिक ताकतों की वजह से हो सकता है। इतिहास इस बात का गवाह है कि समय-समय पर जिन्हें आप बोली कहते हैं, वो भाषा का दर्जा प्राप्त कर लेती हैं और यदि सरकारी राजस्थानी साहित्य का इस्तेमाल युवा पीढ़ी को शिक्षित करने के लिए करेगी, तो बच्चों की कल्पनात्मक रचनात्मकता और वैज्ञानिक चेतना समृद्ध होगी।
यह भी पढ़ें – World Copyright Day – आज जानिए क्यों जरूरी है कॉपीराइट एक्ट ?
राजस्थान प्रदेश की लोकव्यवहार की भाषा राजस्थानी- प्रोफेसर जगदीश गिरी
उधर, राजस्थान विवि के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर जगदीश गिरी ने कहा कि स्वदेशी भाषा का तात्पर्य इस देश की सभी भाषाओं से है। राजस्थान की बात करें तो राजस्थान प्रदेश की लोकव्यवहार की भाषा राजस्थानी है। जिसे एक वैकल्पिक विषय के रूप में पढ़ा जाता है। भले ही राजस्थानी संविधान की आठवीं अनुसूचि में शामिल नहीं हो पाई है। इसकी एक बड़ी वजह राजनीति रही है। लेकिन राजस्थानी भाषा की सभी योग्यता पूरी करती है। ये बीते एक हजार साल से इस्तेमाल होती रही है। इसमें साहित्य लिखा गया है। राजस्थानी उत्तर भारत की सबसे पुरानी भाषाओं में शामिल हैं। जब राजस्थान का एकीकरण हुआ था उस दौरान के पत्र व्यवहार भी राजस्थानी भाषा में ही हुए।प्राचीन काल की कई पांडुलिपियों में राजस्थानी भाषा का प्रयोग हुआ है। वर्तमान की बात करें तो राजस्थानी भाषा जितनी समृद्ध है उस क्षमता से उसका उपयोग नहीं हो रहा है। लेकिन जितना पाठ्यक्रम हिंदी का पढ़ाया जाता रहा है उसमें एक अध्याय राजस्थानी भाषा का रहा है। 11वीं और 12वीं में राजस्थानी को वैकल्पिक विषय के रूप में विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। यूजीसी राजस्थानी में नेट करवा रही है। राजस्थान के तीन विश्वविद्यालय में राजस्थानी के विभाग चल रहे हैं। साथ ही इनमें पीएचडी हो रही है। प्रदेश में जनता आज भी राजस्थानी में ही अपनी बात कहना पसंद करती है।