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World Mental Health Week : कोविड 19 का पड़ रहा है मनोवैज्ञानिक और मानसिक असर

जयपुर . Covid 19 महामारी फैलने के बाद उत्पन्न हुए Psychological और Mental स्वास्थ्य से जुड़े पहलुओं का समाज के सभी क्षेत्रों पर व्यापक रूप से असर दिखाई दिया है।

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जयपुर . कोविड 19 ( Covid 19 ) महामारी फैलने के बाद उत्पन्न हुए मनोवैज्ञानिक ( Psychological ) और मानसिक ( Mental ) स्वास्थ्य से जुड़े पहलुओं का समाज के सभी क्षेत्रों पर व्यापक रूप से असर दिखाई दिया है। लोगों में डर, चिंता, अनिश्चितता, असुरक्षा की भावना, हताशा और यहां तक कि कई मामलों में तो अवसाद जैसे गंभीर बीमारी के लक्षण भी दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में, इस समय यह अत्यधिक प्रासंगिक हो जाता है कि मानसिक रोगों से ग्रसित व्यक्तियों के मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जाए, खास रूप से उन मरीजों के बारे में जो किसी गंभीर मानसिक बीमारी से ग्रस्त हैं।


आईआईएचएमआर यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डॉ नूतन प्रभा जैन ने बताया कि कोविड—19 का व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक प्रभाव बहुत लम्बे समय तक रहने की संभावना है। यह शायद इस पीढ़ी के लिए लम्बे समय तक और मानव संसाधन के सभी पहलुओं की सीमाओं का परीक्षण करेगा। इस महामारी से जो लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होते हैं उनका जीवन आजीविका और इसके आगे का नुकसान अकल्पनीय है। यह स्थिति कब तक चलेगी और कोई नहीं जानता कि यह कब और कैसे समाप्त होगा। शायद कोविड वैक्सीन या किसी अन्य प्रकार का प्रभावी उपचार लेकिन अभी वह बहुत दूर की बात है। संक्रमण के किसी भी संभावित स्त्रोत से दूर रहना इस समय केवल एक उम्मीद के साथ हमें आगे बढ़ाता है कि संक्रमण की श्रंखला अंततः टूट जाएगी।


डॉ नूतन प्रभा ने बताया कि कोविड—19 महामारी ने दुनियाभर के लोगों का जीवन बाधित कर दिया है। लोग एक-दूसरे से सीखते हैं कि ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में सकारात्मक और रचनात्मक कैसे बने। मीडिया के माध्यम से भी प्रचार किया जा रहा है, परन्तु अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि सोशल मिडिया इस बात को उजागर करता है कि लोग अपने समय का सबसे अच्छा उपयोग कैसे कर रहे हैं जैसेः योग से लेकर नृत्य तक खाना पकाने से लेकर किताबें पढ़ने तक आदि।


ईएसआई मॉडल अस्पताल के मनोरोग विभाग के डॉ अखिलेश जैन ने बताया कि ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत में तकरीबन 19 करोड़ 73 लाख लोग किसी ना किसी प्रकार की मानसिक बीमारी से ग्रसित हैं, यह आंकड़ा देश की कुल जनसंख्या का लगभग 14.3 प्रतिशत हैं। आंकड़े ये भी बताते हैं कि प्रत्येक बीस में से एक व्यक्ति अपने जीवनकाल के दौरान अवसाद का शिकार होता है और दुनियाभर में हर चालीस सेकंड में एक आत्महत्या की घटना होती है।