
World Poetry Day राजस्थान में अलग— अलग बोली जाने वाली बोलियों को बरकार रखने के लिए अब युवा हिंदी और अंग्रेजी के साथ ही स्थनीय बोली में कविताएं लिख अपनी पहचान बना रहे हैं। अपने साहित्य के माध्यम से अपनी बोली और संस्कृति से जोड़ रहे हैं। राजस्थान पत्रिका ने ऐसे ही कुछ युवाओं से बातचीत की जो अपने लेखन के माध्यम से लोगों को जागरूक और शिक्षित कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी अपने पेज बनाकर अपनी भाषा की महक चारो ओर फैला रहे हैं।
डिंगल — पिंगल में लिखी 'डाँडी रौ उथळाव'
बाड़मेर निवासी 28 वर्षीय तेजस मुंगेरिया हिंदी में पीएचडी कर रहे हैं। लेकिन साथ ही वह डिंगल — पिंगल बोलियों में लगातार कविताएं भी लिख रहे हैं। कवि सम्मेलनों में भी वह इन्हीं बोलियों में कविताएं सुनाते हैं। उन्होंने बताया कि मेरी पीएचडी हिंदी में चल रही है, लेकिन कविता लिखने में जो विचार काम आते हैं, वे सभी दिमाग में क्षेत्रीय भाषा के रूप में आते हैं। बचपन से हिंदी, अंग्रेजी ही नहीं क्षेत्रीय भाषा को भी सुना और बोला है, इसलिए यही मेरी अभिव्यक्ति का आधार बन गई। बस यहीं से क्षेत्रीय बोली में कविता लिखना शुरू किया जो लोगों को हिंदी से अधिक पसंद आने लगी। कविताओं का समाज को बदलने और लोगों को जागरूक करने में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। लोग अपनी बोली से तुरंत कनेक्ट होते हैं। 2022 में तेजस ने दांडी रो उथलाव नामक कविता संग्रह लिखा, जिसे लोगों ने काफी सराहा।
हाड़ौती में तत्पुरुष, पंचभूत और अंतर्दश किताबें लिखी
कोटा निवासी 31 वर्षीय किशन प्रणय शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हैं। अब तक उन्होंने कविताओं पर छह किताबें लिखी हैं। जिसमें हाड़ौती में तत्पुरुष, पंचभूत और अंतर्दश किताबें लिखी हैं। उन्होंने बताया कि उनके दादाजी कबीर, रैदास और मीरा जैसे पुराने कवियों को पढ़ते थे उन्हें देखकर बचपन से ही कविताओं के प्रति उनका लगाव बढ़ गया। 24 वर्ष की उम्र में हाड़ौती और मालवी बोली में कविताएं लिखने लगा। राजस्थान में युवा जो गांव से शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं, उनका क्षेत्रीय बोली से जुड़ाव खत्म हो रहा है। तब लोगों को पुन: अपनी बोली और संस्कृति से जोड़ने के लिए मुझे कविता बेहतर माध्यम लगा। बाजार में क्षेत्रीय बोली में किताबें कम हैं क्योंकि लोग लिखने में संकोच करते हैं। आने वाली पीढ़ी के लिए लोक भाषाओं में लिखना जरूरी है। यही सोचकर ज्यादातर कविताएं राजस्थानी भाषा में लिखी हंै।
स्थानीय बोली से विचारों में आई मजबूती
हनुमागढ़ निवासी 33 वर्षीय शिव बोधि 5 वीं कक्षा से ही कविता लिखना शुरू कर दिया था। आदिवासी समुदाय, पिछड़ा व दलित वर्ग और शोषण पर लगातार कविताएं लिख रहे हैं। शुरूआत हिंदी भाषा से कि क्योंकि हमें जानकारी ही नहीं थी की रीजनल भाषा में भी कविता लिखी जा सकती है। क्योंकि जो भाषा हम बोल रहे थे वो हमारी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं थी। जो घर में बोली जाती है उसमें लिखा भी जाता होगा यह मालूम नहीं था। हमारे एक पीटीआई टीचर थे उन्होंने बोला की राजस्थानी भाषा में कविता लिखो। वहां से स्थानीय बोली में लिखना शुरू किया। फिर यह बात ज्यादा मजबूती से समझ आयी कि जो हम बोल रहे थे उसमें लिखना दूसरी किसी भाषा में लिखने से ज्यादा बेहतर है और अच्छे से लिखा जा सकता था। हम जो हमारी भावनाएं अपनी भाषा में सोच रहे थे वह ज्यादा मौलिक है। लिटरेचर फेस्टिवल में लगातार भाग ले रहा हूं।
किसान , मजदूर, महिला पर लिख रहे कविता
करौली निवासी 39 वर्षीय अमर दलपुरा शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत है। वे किसान , मजदूर, महिला व निजी जीवन और राजनीति के विषयों पर कविताएं लिखते हैं। माड़ जगरूति बोली में लिखते हैं। 2017 से कविता लिखने की शुरूआत हुई। उन्होंने बताया कि जब साहित्य को पढ़ा तो लगा मैं भी लिख सकता हूं। लेकिन जो विचार आ रहे थे वो स्थानीय बोली में आ रहे थे। उसके बाद रिसर्च की स्थानीय भाषा पर कविताएं और जब उन्हें पढ़ा तो लगा इसमें भी लिखी जा सकती है। मुझे मेरी बात कहने में हिंदी की बजाय क्षेत्रीय बोली में ज्यादा सहुलियत महसूस होती है। इसका खास कारण है कि बचपन उसी भाषा में गुजरा है। लोगों में राजनीति और अपने अधिकारों की जानकारी के उनकी बोली में उन तक पहुंच रही है। कई समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित हो चुकी है।
Published on:
21 Mar 2024 04:40 pm
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