22 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

हर बीमारी से उबारने में मदद करेंगी ये योग मुद्राएं

इम्यून सिस्टम को मजबूत करने के लिए के लिए प्राण मुद्रा आसन बहुत फायदेमंद होता है

2 min read
Google source verification

ज्ञान मुद्रा
ज्ञान मुद्रा किसी भी आसन या स्थिति में की जा सकती है। इसे करने के लिए हाथ की तर्जनी अंगुली के अग्रभाग को अंगूठे के अग्रभाग से मिलाकर रखें एवं हल्का सा दबाव देने से ज्ञान मुद्रा बनती है। स्मरण-शक्ति को बढ़ाने के लिए यह मुद्रा किसी वरदान से कम नहीं है। यह ब्रेन को शॉर्प करने के साथ ही अनिंद्रा की समस्या भी दूर करती है।

गठिया में कारगर वायु मुद्रा
हाथ की तर्जनी अंगुली को मोड़कर अंगूठे की जड़ में लगाने से वायु मुद्रा बन जाती है। हाथ की बाकी सारी अंगुलियां सीधी रहनी चाहिए। इस मुद्रा को आप कभी भी कर सकते हैं। यह मुद्रा शरीर में वायु तत्व को संतुलित करने का काम करती है। इससे वायु विकार संबंधी समस्याओं को दूर किया जा सकता है। गठिया व सीने में दर्द की समस्याओं से राहत पाने के लिए भी इस योग मुद्रा को कारगर माना गया है। वायु मुद्रा के अच्छे परिणाम पाने के लिए इसेे करने के बाद प्राणायाम करना चाहिए।

अग्नि मुद्रा का लाभ लें
इस मुद्रा को करने के लिए सिद्धासन, पद्मासन या सुखासन में बैठ जाएं। इसके बाद अपने दोनों हाथों को घुटनों पर रख लें और हथेलियां ऊपर की ओर रखें। अब पहले अनामिका अंगुली को मोड़कर अंगूठे की जड़ से स्पर्श करें और अंगूठे से इसे दबा लें। शेष अंगुलियों को बिल्कुल सीधा रखें। इस मुद्रा को करने से मेटाबॉलिज्म की दर तेज होकर शरीर का अतिरिक्त फैट बर्न होता है। यह शरीर को मजबूती प्रदान करता है। इस योग मुद्रा को करने से तनाव से भी राहत पाई जा सकती है।

पृथ्वी मुद्रा के लाभ
पृथ्वी मुद्रा करने के दौरान अनामिका अर्थात् सूर्य अंगुली पर दबाव पड़ता है। यह हमारे भीतर पृथ्वी तत्व को जागृत करती है। इस मुद्रा को करने के लिए तर्जनी अंगुली को अंगूठे से स्पर्श कर दबाएं। बाकी बची अंगुलियों को ऊपर की ओर सीधा रखें। इस मुद्रा को करने से शरीर में ब्लड प्रेशर सही रहता है। साथ ही शारीरिक सहनशीलता भी बढ़ती है। कमजोर हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए भी इस मुद्रा का लाभ लिया जा सकता है। पृथ्वी मुद्रा मानसिक थकान एवं शारीरिक कमजोरी दूर करती है।

वरुण मुद्रा
वरुण मुद्रा दो प्रकार की होती है। सबसे छोटी अंगुली को अंगूठे के अग्रभाग से मिलाने पर वरुण मुद्रा बनती है। दरअसल, हाथ की सबसे छोटी अंगुली को जल तत्व का प्रतीक माना जाता है और अंगूठे को अग्नि का। छोटी अंगुली के सिरे को अंगूठे के सिरे से स्पर्श करते हुए धीरे से दबाएं। यह मुद्रा शरीर में वॉटर कंटेंट को बैलेंस रखने का काम करती है। साथ ही तरल पदार्थ का संचार भी सही रहता है, जिससे त्वचा में नमी बनी रहती है। त्वचा संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए इस मुद्रा का लाभ लिया जा सकता है। मांसपेशियों के दर्द से राहत मिलती है। यह मुद्रा त्वचा को सुंदर बनाती है।