
तपते रेगिस्तान की गोद में बसा जैसलमेर जहां स्थापत्य और इतिहास की कहानियां दीवारों पर उकेरी जाती हैं, वहीं यहां की पारंपरिक वेशभूषा हर कदम पर संस्कृति की गर्माहट और मौसम की ठंडक लिए चलती है। यह वेशभूषा केवल पहनावा नहीं, बल्कि वह शीतल लहर है जो 45 डिग्री की गर्मी में भी शरीर और मन को सहज बनाए रखती है। घाघरा, ओढऩी, कुर्ती, अंगरखा और पगड़ी—इन परिधानों में छुपा है सदियों पुराना अनुभव, जिसमें कपड़े का चयन, रंगों की चपलता और कढ़ाई की महीनियां सबकुछ मौसम के अनुसार रचा गया है। हल्के सूती और मलमल के कपड़े न केवल पसीना सोखते हैं, बल्कि शरीर को धूप की तपिश से बचाते हैं। महिलाएं जब घाघरे की परतों में लहराती हैं, तो लगता है जैसे गर्मी की धरती पर रंगों की बारिश हो रही हो।
जैसलमेर के कारीगर आज भी परंपरागत बुनाई, गोटा-पट्टी और शीशा कढ़ाई की तकनीकों को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखे हुए हैं। इन शिल्पों में न केवल सौंदर्य है, बल्कि एक कहानी है—घर, समाज और आत्मसम्मान की।
नया दौर नई सोच लाया है, लेकिन परंपरा की डोर अब भी थामी हुई है। कॉलेज फेस्ट से लेकर सोशल मीडिया तक, जैसलमेर के पारंपरिक परिधान अब मॉडर्न फ्यूजन का हिस्सा बन चुके हैं। लड़कियां जहां घाघरे को क्रॉप टॉप के साथ पहनकर नया ट्रेंड बना रही हैं, वहीं लडक़े धोती-कुर्ते को जैकेट और जूतियों से स्टाइल कर रहे हैं।
देश-दुनिया से आने वाले पर्यटकों में इन परिधानों और आभूषणों की मांग तेजी से बढ़ रही है। इससे जहां स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिल रहा है, वहीं दस्तकारों को पहचान और रोजगार भी मिल रहा है।
लोक संस्कृति विशेषज्ञ डॉ. चित्रा पुरोहित बताती है कि यह वेशभूषा जैसलमेर की जलवायु, परंपरा और सौंदर्यबोध का त्रिवेणी संगम है। यह आधुनिक युग में भी अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है, जो अद्भुत है।
इसी तरह फैशन डिजाइनर दीपक बोथरा का कहना है कि पारंपरिक परिधानों को यदि आधुनिक कट्स और शेड्स में ढाला जाए, तो यह इंटरनेशनल रैम्प तक का सफर तय कर सकते हैं। जैसलमेर की वेशभूषा ब्रांड बनने की पूरी क्षमता रखती है।
Published on:
22 Apr 2025 11:45 pm
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