
साध्वी प्रशमिता महाराज ने धर्मसभा में कहा कि जल का स्वभाव निर्मलता है। जिस प्रकार जल किसी भी अशुचि को दूर कर पवित्रता प्रदान करता है, उसी प्रकार परमात्मा की जल पूजा करते समय यह भावना रखनी चाहिए कि मन और मस्तिष्क भी पूर्णत:4 निर्मल हो जाएं, उनमें राग-द्वेष रूपी अशुचि न रहे। उन्होंने कहा कि जल के समान शुद्ध और पवित्र हृदय से की गई परमात्मा की भक्ति से अकल्पनीय पुण्य का बंधन होता है।
साध्वी ने कहा कि किसी भी तीर्थंकर की प्रतिमा में वीतरागी स्वरूप ही दृष्टिगोचर होता है, जिसमें परिग्रह का लेश भी नहीं होता। जैन रामायण के अनुसार भगवान राम और पांच पांडवों ने भी शत्रुंजय गिरि से सिद्धत्व प्राप्त किया था, जहां आज भी उनकी पूजा सिद्ध स्वरूप में होती है। उन्होंने बताया कि भव्य, अभव्य और जाति भव्य — ये तीन प्रकार की जीवात्माएं होती हैं। प्रत्येक छह माह में एक आत्मा सिद्धत्व को प्राप्त करती है और एक जीव अव्यवहार राशि से व्यवहार राशि में स्थापित होता है।
इस अवसर पर साध्वी अर्हमनिधि महाराज ने नवकार मंत्र के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह शाश्वत मंत्र है, जिसके 68 अक्षरों में अद्भुत ऊर्जा का वास है। मन को स्थिर कर जाप करने से अनंत सिद्धि और मुक्ति प्राप्त होती है। साध्वी परमप्रिया महाराज एवं साध्वी अर्पणनिधि महाराज ने बताया कि भक्तामर तप के तपस्वियों की आराधना पूर्ण हो गई है। अब आगामी पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व में बड़े तप के लिए संघ को तैयार रहना है। प्रवक्ता पवन कोठारी ने बताया कि चतुर्दशी को अनेक सदस्यों ने उपवास आदि तप कर पाक्षिक प्रतिक्रमण में भाग लिया।
Published on:
08 Aug 2025 08:55 pm
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