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अनदेखी से जिले की इस बेहतरीन योजना का हो रहा बुरा हश्र! आखिर ऐसा क्यों ? जानिए पूरी खबर

-भाप बनकर उड़ रहा जिले का अमृत- बरसाती जल के उपयोग की योजना पर अमल नहीं - कृषि कार्य या पेयजल के लिए उपयोग में आनी थी आसमानी नेमत

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use of rain water sceame

Rain provided relief to the farmers

जैसलमेर. मानसून की बारिश का एक दौर समाप्त हो चुका है। इस दौरान जिले में कुल 336 मिलीलीटर बारिश रिकॉर्ड की गई। आने वाले समय में कहीं अतिवृष्टि तो कहीं सामान्य बरसात होगी। इस दौरान एक बार फिर कम वर्षा वाले मरुस्थलीय जिले में अमृत तुल्य समझा जाने वाला करोड़ों गैलन बरसाती पानी भाप बनकर उड़ जाएगा। जबकि आज से दस साल पहले इस पानी के पेयजल अथवा कृषि कार्य में लेने को लेकर प्रशासन ने जिले के अलग-अलग रण क्षेत्रों में जमा होने वाले बरसाती पानी के उपयोग के लिए योजना का पूरा खाका तैयार कर लिया था। लेकिन सरकारी तंत्र व संबंधित प्रशासनिक महकमा इस अहम योजना को बिसरा गया।

रण क्षेत्रों में रोका जाना था पानी
गौरतलब है कि वर्ष 2006-07 में तब के जिला कलक्टर डॉ. केके पाठक की पहल से रण क्षेत्रों में बारिश के पानी को रोककर उसका खेती या पीने के पानी में उपयोग करने की योजना तैयार की गई थी। पानी के लिए वर्षों से तरसने वाले इस सरहदी जिले के रण क्ष् ोत्रों में जमा पानी को रोकने के लिए अभी तक कोई इंतजाम देखने को नहीं मिल रहे हैं। यही कारण है कि खाभा व रूपसी जैसे मीठे पानी की प्रकृति वाले रणों में बरसाती पानी को रोककर खारे पानी में मिलने से रोकने और खड़ीनों को छोटे भागों में बांटकर और पम्पिंग के जरिए किसानों को कृषि कार्यों में दिए जाने की योजना आज भी अमल के इंतजार में है। गौरतलब है कि वर्ष 2006 में अतिवृष्टि के कारण वर्षों बाद जिले के खड़ीनों में काफी मात्रा में पानी एकत्रित हुआ था। बड़ी मात्रा में जमा पानी का कोई उपयोग नहीं हुआ। जानकारों के अनुसार खाभा, ब्रह्मसर, पोहड़ा, काणोद, हड्डा, लाणेला व रूपसी के रण क्षेत्रों में जल संग्रहण की अद्भुत क्षमता है। विशाल भौगोलिक क्षेत्र में फैले इस रण के पानी का सदुपयोग कर लंबे समय तक उपयोग किया जा सकता है।

किस तरह बने रण क्षेत्र
- जैसलमेर जिले में 40 से 50 किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले ये रण प्राचीन समय में प्रवाहित होने वाली नदी के विलुप्त होने से बने हैं।
- नदी में पानी नहीं आने से यहां बचा अवशेष पानी सूर्य की गर्मी के कारण भाप बनकर उड़ गया।
- बार-बार पानी के उडऩे के कारण पानी में स्थित तत्व खनिज लवण के रूप में जमते रहे। यही कारण है कि ये रण स्वाद में खारे हैं।
- काणोद व हड्डा के रण खारे हैं, वहीं खाभा व रुपसी के रण मीठे हैं। इसी कारण यहां पानी में खड़ीन के माध्यम से खेती की जाती है।
- रण मीठे होने का कारण यह भी है कि यहां स्थित मिट्टी में खारापन कम है। इसके अलावा पानी का भू सतह के नीचे अवशोषण भी होता है।
- खारे रण में भूमि के रिसाव कम होने से पानी का ठहराव अधिक होता है। वाष्पीकरण के कारण खारापन अधिक रहता है।

अगर ऐसा किया जाए...
- खारे पानी में मिलने से पहले ही मीठे पानी के रण को छोटे खड़ीनों में बांटकर लंबे समय तक कृषि कार्यों में वहां जमा पानी का उपयोग किया जा सकता है।
- बारिश के बाद लबालब भरे रण के पानी के प्रवाह को एनीकट से रोककर कृषि योग्य भूमि में खेती के लिए काम में लिया जा सकता है।

अब तक औसत 57 एमएम बारिश
जिले में प्रतिवर्ष औसतन 165 मिलीमीटर पानी बरसता है।इस वर्ष अब तक यहां औसतन 57 मिमी पानी बरस चुका है। जिले के 6 रेन गेज स्टेशनों में से जैसलमेर में 87, पोकरण में 82, फतेहगढ़ में 63, सम में 29, रामगढ़ में 36 और नोख में 29 मिमी बारिश हुई है। इस तरह से 336 मिमी बरसात हुई है।