
थार में गर्मी की शुरुआत के साथ ही वन संपदा पर खतरे के संकेत तेज हो गए हैं। तापमान 46 डिग्री को पार कर चुका है, लगातार बढ़ रहा है और इसके साथ वन व नहरी क्षेत्रों में दावानल की आशंका भी बढ़ने लगी है। विगत वर्षों की घटनाएं पहले ही चेतावनी दे चुकी हैं, लेकिन इस बार भी जमीनी तैयारी उतनी मजबूत नजर नहीं आ रही। दर्जनों मामलों में हरियाली कुछ ही समय में राख में बदल गई। बीते वर्षों में हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र दावानल की चपेट में आ चुका है।
9 मार्च: पोछिना गांव के पास आग, करीब दो किलोमीटर क्षेत्र प्रभावित
24 मार्च: चाचा गांव के पास हाईवे किनारे सैकड़ों पौधे जले
25 मार्च: देवा माइनर की वन पट्टी में आग, वनस्पति और जीवों को नुकसान
-गर्मी के साथ दावानल का खतरा कई कारणों से बढ़ता है—
-सूखी घास और झाड़ियों में मामूली चिंगारी से आग भड़कना
-खेतों में अवशेष जलाने की प्रवृत्ति
-खुले में आग छोड़ देना
-टूटे या झूलते बिजली तारों से चिंगारी
-तेज हवाओं से आग का तेजी से फैलना
-जमीनी स्तर पर सबसे बड़ी चिंता संसाधनों की कमी है—
-दूरस्थ वन क्षेत्रों में दमकल की समय पर पहुंच नहीं
-नहरी पट्टियों में स्थायी फायर यूनिट का अभाव
-सीमित मानव संसाधन और उपकरण
-शुरुआती समय में नियंत्रण नहीं होने से आग विकराल बनती है
-वन्यजीवों के आवास नष्ट, कई जीव मारे जाते हैं
-जैव विविधता पर सीधा असर, पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ता
-धुएं से वायु प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग में इजाफा
-मिट्टी की उर्वरता घटने से भूमि बंजर होने का खतरा
-खेत, घर और जल स्रोत प्रभावित, ग्रामीण जीवन प्रभावित
-आशंका को देखते हुए समय रहते कदम जरूरी
-संवेदनशील क्षेत्रों की नियमित निगरानी
सूखी वनस्पति और कचरे की सफाई
-स्थानीय स्तर पर पानी के टैंकर और फायर यूनिट की व्यवस्था
-मोबाइल अलर्ट और सायरन से त्वरित सूचना
प्रशासन, वन विभाग और ग्रामीणों के बीच समन्वय
पर्यावरण विश्लेषक डॉ. ओमप्रकाश चौधरी के अनुसार मरुस्थलीय क्षेत्रों में गर्मी के दौरान दावानल की आशंका हर साल रहती है, लेकिन हाल के वर्षों में इसकी तीव्रता बढ़ी है। नहरी और वन क्षेत्रों में सूखी घास व झाड़ियों के कारण मामूली चिंगारी भी बड़ी आग में बदल जाती है। तेज हवाएं आग को तेजी से फैलाती हैं। कई मामलों में खेतों में अवशेष जलाना या वाहनों से निकली चिंगारी कारण बनती है। सबसे बड़ी चुनौती समय पर नियंत्रण की है, क्योंकि संसाधनों की कमी बनी हुई है। उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में सतर्कता, तकनीकी निगरानी और स्थानीय प्रशिक्षण से नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
Published on:
30 Apr 2026 08:15 pm
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