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Jaisalmer: गोडावण के तीन चूजों का जन्म: एक का जन्म जंगल से मिले अंडे से, दो का कृत्रिम गर्भाधान से हुआ

राज्य पक्षी गोडावण संरक्षण कार्यक्रम को बड़ी सफलता मिली है, जैसलमेर के ब्रीडिंग सेंटर में 3 नए चूजों ने जन्म लिया है। यह जन्म एक जंगली संग्रहित अंडे और दो कैप्टिव-लेड अंडों से हुआ, जिसकी जानकारी केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव ने दी।

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जैसलमेर. जिले में गोडावण के तीन चूजों का हुआ जन्म।

जैसलमेर. दुर्लभ राज्य पक्षी गोडावण को लेकर एक बार फिर खुशखबरी आई है। जैसलमेर जिले के गोडावण ब्रीडिंग सेंटर में 2 और जंगल से उठाए गए एक अंडे से कुल नन्हे चूजों ने हालिया दिनों में आंखें खोली हैं। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव ने इस आशय की जानकारी एक ट्वीट के माध्यम से दी। उन्होंने बताया कि प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के तहत पिछले कुछ दिनों में एक जंगली-संग्रहित और दो कैप्टिव-लेड अंडों से संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम में 3 नए चूजों का जन्म हुआ है। जीआइबी कैप्टिव प्रजनन कार्यक्रम के चौथे वर्ष में, अब तक 26 चूजे जन्म ले चुके हैं, जिनमें 18 कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से, 4 प्राकृतिक प्रजनन और 4 जंगल से एकत्रित अंडों से जन्में हैं। उनके अनुसार इन जंगली अंडों के बदले में, संस्थापक आनुवंशिक विविधता में सुधार करने और शिकार के जोखिम को कम करने के लिए, जंपस्टार्ट हस्तक्षेप के माध्यम से, राजस्थान में 3 चूजों ने जंगल में जन्म लिया है। गोडावण संरक्षित केंद्रों में अब इन पक्षियों की संख्या बढ़ कर 94 हो गई है। मंत्री ने बताया कि इस मौसम में और अधिक चूजों की उम्मीद है।

जिले में दो सेंटर कार्यरत

गौरतलब है कि जैसलमेर जिले में वन विभाग और प्रोजेक्ट जीआइबी के तहत सम के सुदासरी और रामदेवरा में गोडावण ब्रीडिंग सेंटरों का संचालन किया जा रहा है। इन सेंटरों में नर-मादा गोडावण की मेटिंग से चूजों का जन्म भी हुआ है, साथ ही जंगलों से सुरक्षित ढंग से उठाए गए अंडों से भी पक्षियों ने जन्म लिया है। यहां गोडावण के अंडों को विशेषज्ञों की देखरेख में सहेजा जाता है और पूर्णतया वैज्ञानिक विधि से उनका सुरक्षित जन्म करवाया जाता है। साल 2018 में सेंटरों की स्थापना की गई और अब एक के बाद एक इन सेंटरों से गोडावण के जन्म की सुकून देने वाली खबरें मिल रही हैं।

भीषण गर्मी में छह कुरजां गायब, प्रवासी पक्षियों का संकट

प्रतिवर्ष सात समंदर पार कर शीतकालीन प्रवास पर लाठी व आसपास के क्षेत्र में आने वाले मेहमान पक्षी कुरजां की इस बार वतन वापसी के बाद छह कुरजां अपने समूहों से बिछुड़कर खेतोलाई गांव के तालाबों पर पीछे रह गई थीं। यहां की भीषण गर्मी सहन करते हुए अब ये सभी पक्षी दिखना बंद हो गए हैं। खेतोलाई गांव के तालाबों पर अब एक भी कुरजां नजर नहीं आ रही है। सामान्यतया कुरजां पक्षी मंगोलिया, चीन, कजाकिस्तान, रूस के ठंडे इलाकों में रहती हैं। बर्फबारी के दौरान भोजन की विकट परिस्थितियों के कारण वे शीतकालीन प्रवास पर निकल जाती हैं। कुरजां सामान्यतया 30-32 डिग्री सेल्सियस तापमान पर अनुकूल महसूस करती हैं। जैसे ही यहां गर्मी दस्तक देती है, कुरजां वतन वापसी की उड़ान भर लेती हैं। ऐसे में समूह से बिछुड़ने के बाद पीछे रहे इन पक्षियों के लिए यहां का 48-49 डिग्री तापमान सहन करना अपूर्व रूप से कठिन होता है। फरवरी माह में कुरजां ने वतन वापसी शुरू कर दी थी और मार्च में अधिकांश पक्षियों के समूह यहां से निकल गए थे। इस दौरान छह पक्षी यहीं रह गए थे। अप्रेल माह तक तो ये छह पक्षी नियमित रूप से दिख रहे थे, फिर मई में पांच और मई के अंतिम सप्ताह में चार पक्षी ही दिख रहे थे। जून में सभी पक्षी दिखना बंद हो गए। ऐसे में अन्य पक्षी कहां गए, इसकी कोई जानकारी नहीं मिल पाई है। पक्षी प्रेमी पंकज विश्नोई, खेतोलाई ने बताया कि खेतोलाई गांव के तालाबों पर पीछे रही छह कुरजां में से अब एक भी नहीं दिख रही है। सभी कुरजां पक्षियों के बारे में अब तक कोई जानकारी नहीं मिल पाई है।