
जैसलमेर के अलग-अलग लोकेशन पर चल रही शूटिंग ।- फाइल
जैसलमेर. कभी रेगिस्तान की सुनहरी रेत पर कैमरों की चमक लगातार दिखाई देती थी। सोनार किला, सम के धोरे, गड़ीसर, कुलधरा और ऐतिहासिक हवेलियां बड़े पर्दे की पहचान बन चुकी थीं। बॉलीवुड से लेकर विदेशी प्रोडक्शन हाउस तक जैसलमेर को अपनी फिल्मों का अहम किरदार मानते थे। अब तस्वीर बदल चुकी है। पिछले कई अरसे से किसी बड़े हिंदी या अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट की शूटिंग यहां नहीं हुई। फिल्म उद्योग में आए बदलाव बताते हैं कि अब केवल खूबसूरत लोकेशन पर्याप्त नहीं है। फिल्मकार ऐसी जगह तलाश रहे हैं, जहां प्राकृतिक सौंदर्य के साथ आधुनिक स्टूडियो, तकनीकी ढांचा, तेज अनुमति प्रणाली और कम लागत वाला शूटिंग इकोसिस्टम भी उपलब्ध हो। यही कारण है कि जैसलमेर जैसी विश्वस्तरीय प्राकृतिक लोकेशन भी प्रतिस्पर्धा में पिछड़ती दिखाई दे रही है। फिल्म पर्यटन से जुड़े जानकारों के अनुमान के अनुसार बड़े प्रोजेक्ट नहीं आने से जैसलमेर की करीब 40 करोड़ रुपए सालाना की फिल्म इकोनॉमी प्रभावित हुई है। इसका असर होटल, रिसॉर्ट, परिवहन, ऊंट सफारी, स्थानीय कलाकार, तकनीकी कर्मियों, हस्तशिल्प कारोबार और पर्यटन आधारित सेवाओं पर साफ दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि एक बड़ी फिल्म की शूटिंग स्थानीय बाजार में करोड़ों रुपए का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कारोबार पैदा करती है।
फिल्म विशेषज्ञों के अनुसार फिल्मों और वेब सीरीज की विषयवस्तु तेजी से बदली है। पहले ऐतिहासिक, ग्रामीण और मरुस्थलीय पृष्ठभूमि वाली फिल्मों की संख्या अधिक थी, जबकि अब शहरी जीवन, कॉरपोरेट संस्कृति, अपराध, तकनीक और आधुनिक जीवनशैली पर आधारित कंटेंट का वर्चस्व बढ़ गया है। ओटीटी प्लेटफॉर्म के विस्तार और वीएफएक्स तकनीक ने भी स्टूडियो आधारित शूटिंग को बढ़ावा दिया है। इससे प्राकृतिक लोकेशनों की जरूरत पहले की तुलना में कम हुई है।
-आधुनिक स्टूडियो और साउंड स्टेज
-पोस्ट-प्रोडक्शन की स्थानीय सुविधा
-कम समय में शूटिंग अनुमति
-तकनीकी उपकरण और विशेषज्ञ टीम
-एकीकृत शूटिंग इकोसिस्टम
-नीति और प्रोत्साहन भी बने निर्णायक
फिल्म पर्यटन अब राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा का बड़ा विषय बन चुका है। कई राज्य आर्थिक प्रोत्साहन, टैक्स राहत, सिंगल विंडो अनुमति और तकनीकी सहयोग जैसी सुविधाएं उपलब्ध करा रहे हैं। राजस्थान में घरेलू फिल्मों को बढ़ावा देने वाली नीति प्रभावी है, लेकिन विदेशी प्रोडक्शन के लिए आकर्षण पहले जैसा नहीं माना जा रहा। केंद्र स्तर पर विदेशी फिल्मों के लिए मिलने वाले प्रोत्साहन बंद होने के बाद अंतरराष्ट्रीय निर्माता दूसरे राज्यों और देशों की ओर बढ़े हैं।
बड़ी फिल्मों की शूटिंग केवल कलाकारों तक सीमित नहीं रहती। एक प्रोजेक्ट के साथ दर्जनों स्थानीय व्यवसाय जुड़ते हैं और हजारों मानव-दिवस का रोजगार सृजित होता है।
-होटल और रिसॉर्ट
-टैक्सी व परिवहन
-ऊंट सफारी
-स्थानीय गाइड
-हस्तशिल्प बाजार
-खानपान सेवाएं
-जूनियर कलाकार
-तकनीकी श्रमिक
जैसलमेर में फिल्मांकन का इतिहास लगभग पांच दशक पुराना है। रेशमा और शेरा तथा सोनार किला से शुरू हुआ सफर लेकिन, लम्हे, ढाई अक्षर प्रेम के, मुंबई से आया मेरा
दोस्त, बजरंगी भाईजान, टशन, नन्हे जैसलमेर और बच्चन पांडे जैसी फिल्मों तक पहुंचा। इन फिल्मों ने स्वर्णनगरी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई तथा पर्यटन को उल्लेखनीय गति दी।
-भारत में ओटीटी कंटेंट का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है।
-अधिकांश बड़े प्रोजेक्ट मल्टी-लोकेशन शूटिंग मॉडल अपना रहे हैं।
-शूटिंग लोकेशन चुनने में तकनीकी सुविधाओं का महत्व पहले से कहीं अधिक हो गया है।
-फिल्म पर्यटन स्थानीय अर्थव्यवस्था को कई गुना गति देने वाला क्षेत्र माना जाता है।
जैसलमेर की सबसे बड़ी ताकत उसकी प्राकृतिक लोकेशन है, जिसका विकल्प कृत्रिम सेट नहीं बन सकते। यदि आधुनिक शूटिंग सुविधाएं, प्रतिस्पर्धी प्रोत्साहन, अंतरराष्ट्रीय स्तर की ब्रांडिंग और तेज अनुमति व्यवस्था विकसित की जाए तो स्वर्णनगरी फिर बड़े फिल्म बैनरों की पहली पसंद बन सकती है।
-तनसिंह पूनमनगर, व्यवस्थापक, व्यवस्थापक, फ़िल्म शूटिंग
Published on:
03 Jul 2026 08:41 pm
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