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Jaisalmer: ममता भी ओढ़ी, जिम्मेदारियां भी निभाई…पिता ने संतानों के सपनों को दी उड़ान

पत्नी के निधन के बाद जब परिवार बिखरने की आशंका थी, तब जैसलमेर के दो पिताओं ने खुद को संभालकर बच्चों के लिए मां और पिता, दोनों की भूमिका निभाई। वर्षों तक संघर्ष, त्याग और ममता के बल पर उन्होंने संतानों के सपनों को टूटने नहीं दिया। फादर्स डे पर पढ़िए ऐसे सिंगल फादर्स की प्रेरक कहानी, जिनकी तपस्या ने बच्चों को सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

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मां और पिता दोनों की भूमिका निभाकर संतानों को सफलता की नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले जैसलमेर के प्रेरणादायी सिंगल फादर्स।

जैसलमेर. हर बच्चा जब डरता है तो सबसे पहले मां को पुकारता है। लेकिन अगर एक दिन वह आवाज हमेशा के लिए घर से चली जाए तो... उस खालीपन को कौन भरता है? कौन बच्चों के आंसू पोंछता है, उनकी पसंद का खाना बनवाता है, स्कूल के लिए तैयार करता है, बुखार में पूरी रात जागता है और फिर सुबह खुद मजबूत चेहरा लेकर उनके सामने खड़ा हो जाता है? शायद इसका जवाब केवल वही पिता दे सकता है, जिसने अपने दुख को सीने में दफन कर बच्चों की मुस्कान बचाने का फैसला किया हो। फादर्स डे पर जैसलमेर के दो ऐसे सिंगल फादर्स की कहानी सामने आती है, जिन्होंने पत्नी के निधन के बाद केवल परिवार नहीं संभाला, बल्कि अपने बच्चों के सपनों को भी टूटने नहीं दिया। उन्होंने कभी यह एहसास नहीं होने दिया कि घर में मां नहीं है। उन्होंने बच्चों के लिए ममता भी बनकर दिखाई और अनुशासन भी सिखाया। वर्षों बाद जब उनकी संतानें अफसर बनीं और अपने पैरों पर खड़ी हुईं, तब लोगों ने उनकी सफलता देखी, लेकिन उस सफलता के पीछे छिपी पिता की अनगिनत जागी रातें, अधूरे सपने और मौन संघर्ष बहुत कम लोगों ने देखे।

तीन बेटों के लिए खुद को फिर से गढ़ लिया

सांगड़ गांव निवासी उगमदान बारहठ की दुनिया उस दिन बदल गई, जब उनकी पत्नी संतोष कंवर का असमय निधन हो गया। तीनों बेटे छोटे थे। एक तरफ पत्नी को खोने का गहरा दुख था, दूसरी तरफ बच्चों की आंखों में भविष्य का डर। खुद शिक्षा अधिकारी रह चुके उगमदान बारहठ ने उसी दिन तय कर लिया कि उनके बच्चे परिस्थितियों से नहीं, अपने सपनों से पहचाने जाएंगे। उन्होंने मां की ममता और पिता का अनुशासन दोनों निभाए। पढ़ाई को सबसे बड़ी पूंजी बनाया और हर बच्चे की क्षमता के अनुसार उसका मार्गदर्शन किया। आज बड़े बेटे ललित चारण तहसीलदार हैं, दूसरे बेटे अशोक चारण भारतीय राजस्व सेवा में संयुक्त आयुक्त हैं और तीसरे बेटे हिम्मतसिंह चारण अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के पद पर सेवाएं दे रहे हैं। वे कहते हैं -बच्चों को सबसे बड़ी विरासत संपत्ति नहीं, संस्कार और आत्मविश्वास देकर जाया जा सकता है।

बेटियों की मुस्कान ही जीवन का संबल बनी

कोरोना महामारी के दौरान सुशील गोपा से उनकी जीवनसंगिनी पद्मा गोपा को छीन लिया। घर में दो बेटियां थीं। उस कठिन समय में उन्होंने बेटियों के सामने कभी अपने दर्द को हावी नहीं होने दिया। उन्होंने पिता के साथ मां की भूमिका भी निभाई। कभी पढ़ाई का हौसला बढ़ाया, कभी असफलता में कंधा दिया और कभी मां की तरह उनकी छोटी-छोटी जरूरतों का ख्याल रखा। वर्तमान में सुशील गोपा पोक्सो न्यायालय में कार्यालय अधीक्षक पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। आज बड़ी बेटी नेहा यूपीएससी की तैयारी कर रही हैं, जबकि छोटी बेटी वसुंधरा कानून की पढ़ाई पूरी कर हाईकोर्ट में अधिवक्ता के रूप में प्रैक्टिस कर रही हैं। सुशील गोपा कहते हैं, जब बेटियां मुस्कुराती हैं तो लगता है, उनकी मां आज भी हमारे साथ है।