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ऐसे तो कैसे होगा परंपरागत पेयजल स्त्रोतों का संरक्षण?

- मुख्य तालाब व परंपरागत पेयजल स्त्रोत हुए उपेक्षा के शिकार

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pokaran sarovar

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पोकरण. जल स्वालंबन अभियान चलाकर बारिश के पानी को संरक्षित करने के नाम पर जिले में भले ही लाखों रुपए खर्च कर दिए गए है, लेकिन पोकरण के परपरांगत पेयजल स्त्रोत अभी भी उपेक्षा का दंश झेलने को मजबूर है। हालात ये है कि यहां के पोरख व तालाबों के घाट व आगोर की बदहाल स्थिति होने से इनका अस्तित्व खतरे में है। गौरतलब है कि राज्य सरकार की ओर से मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन योजना का संचालन कर परंपरागत पेयजल स्त्रोतों के रख रखाव व बारिश के पानी का संग्रहण कर उसे पीने के लिए उपयोग लेने तथा परंपरागत पेयजल स्त्रोतों का संरक्षण करने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। जबकि कस्बे के मुख्य तालाब व परंपरागत पेयजल स्त्रोत लम्बे समय से उपेक्षा के शिकार होने से उनका अस्तित्व खतरे में पड़ता जा रहा है। जिसको लेकर सरकार, स्थानीय प्रशासन, नगरपालिका की ओर से कोई प्रयास नहीं किए जा रहे है। गौरतलब है कि सैंकड़ों वर्षों तक पोकरण कस्बे में निर्मित तालाब यहां के परंपरागत पेयजल स्त्रोत रहे है। जिनमें महासागर, सालमसागर, रामदेवसर, बांदोलाई, सूधलाई, साधोलाई, मेहरलाई, परबतसर आदि कस्बे के मुख्य तालाब है। इन तालाबों में बारिश के दौरान जल संग्रहण किया जाता था तथा वर्षभर कस्बेवासी उसका पेयजल के रूप में उपयोग करते थे।
मुख्य तालाबों की हो रही है उपेक्षा
जानकारो की माने तो शहर के मध्य में पोकरण फोर्ट के पीछे स्थित सालमसागर मुख्य तालाब मुख्य रुप से यहां परंपरागत पेयजल स्त्रोत रहा है, लेकिन तालाब में पायतन की खुदाई व सफाई कार्य में सरकार की ओर से योगदान नहीं मिलने से तालाब की आगोर व पायतन का दायरा सिकुड़ता जा रहा है। हालात ये है कि बारिश के दिनों में सालमसागर तालाब में बीलिया नदी से होने वाली पानी की आवक क्षेत्र व पायतन में आसपास क्षेत्र में निवास कर रहे लोगों की ओर से कचरा डाला जा रहा है। जिससे पानी की आवक कम हो गई है।
नगरपालिका ने छोड़ी सीवरेज लाइन
जल संग्रहण क्षेत्र बीलिया नदी में नगरपालिका के गंदे पानी के नाले व सीवरेज लाइन लाकर छोड़ देने से तालाब की शुद्धता प्रभावित हो रही है और अभी के हालात ये है कि नदी में गंदगी व बबूल की झाडिय़ां व अतिक्रमण होने से जलग्रहण क्षेत्र कम होता जा रहा है। जिसके चलते तालाब में बारिश के पानी की अच्छी आवक होने के बावजूद तालाब का पानी पेयजल के लिए उपयोगी नहीं रहा।
इनकी भी ये ही कहानी
जानकारो की माने तो रामदेवसर तालाब के आगोर में अतिक्रमण होने, पायतन की सफाई नहीं हो रही और यहां गंदगी के ढेर जमा हो रहे है, तालाब के पायतन में घास उग आने से पानी गंदा हो रहा है। इसके अलावा तालाब के घाट भी कई वर्षों से क्षतिग्रस्त है। ऐसे में बारिश के पानी की पर्याप्त आवक के बाद भी पीने के पानी के रूप में इसका उपयोग नहीं हो पा रहा। कस्बे के बांदोलाई, सूधलाई व मेहरलाई तालाब के चारों तरफ व जलग्रहण क्षेत्र में भी गंदगी के ढेर और अतिक्रमण के चलते इनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। उत्तर की तरफ पहाड़ी की गोद में स्थित महासागर तालाब में भी बबूल की झाडिय़ां उगने से बारिश के दौरान उसमें जमा पानी पशुओं की पहुंच से भी दूर हो गया।
तालाबों के जीर्णोद्धार की जरुरत
कस्बे के सभी तालाब प्रशासनिक उपेक्षा के शिकार होने के कारण उनका पेयजल स्त्रोत के रूप में उपयोग नहीं लिया जा रहा है। लगभग सभी तालाबों की पर्याप्त आगोर होने व बारिश के पानी की अच्छी आवक होने के बावजूद उनका उपयोग नहीं हो रहा है। प्रशासन की ओर से इन सभी तालाबों व परंपरागत पेयजल स्त्रोतों की खुदाई, जीर्णोद्धार, तालाब के पायतन व जलग्रहण क्षेत्र की सफाई की जाती है, तो इन तालाबों में जमा पानी का पेयजल के रूप में भी उपयोग किया जा सकता है।
नहीं मिली है स्वीकृति
नगरपालिका की ओर से मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन योजना के अंतर्गत स्थानीय तालाबों व बावडिय़ों के जीर्णोद्धार को लेकर डीपीआर तैयार कर राज्य सरकार को भिजवाई गई थी, लेकिन प्रथम चरण में बावडिय़ों के जीर्णोद्धार के लिए स्वीकृति दी गई है। पुराने तालाबों की खुदाई, सफाई व संरक्षण को लेकर सरकार की ओर से स्वीकृति नहीं दी गई है।
जोधाराम विश्रोई, अधिशासी अधिकारी नगरपालिका, पोकरण।