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दो गुना बढ़ावा देंगे तो चार गुना रफ्तार से बढ़ेगा जैसलमेर पर्यटन का काफिला

- नए सोपान तय करने की दिशा में जैसलमेर का पर्यटन- बॉर्डर पर्यटन से और संवरेगी तस्वीर

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दो गुना बढ़ावा देंगे तो चार गुना रफ्तार से बढ़ेगा जैसलमेर पर्यटन का काफिला

दो गुना बढ़ावा देंगे तो चार गुना रफ्तार से बढ़ेगा जैसलमेर पर्यटन का काफिला

चन्द्रशेखर व्यास
जैसलमेर. थार रेगिस्तान के अंचल में देश के एक कोने में बसे जैसलमेर जैसे छोटे-से शहर और इसके दसियों गांवों की तकदीर बदलने वाले पर्यटन ने एक खास मुकाम को तो छू लिया है। इसे अब कश्मीर, शिमला-मनाली या जयपुर-उदयपुर के स्तर तक ले जाना है तो कई नए कदम उठाने की दरकार शिद्दत से महसूस की जाने लगी है। जैसलमेर भ्रमण पर आने वाले सैलानियों का एक या दो रात ठहराव कैसे तीन-चार रातों तक बढ़ जाए, यह सभी जिम्मेदारों की साझा चिंता में शुमार होना चाहिए। अच्छी बात यह है कि पिछले अर्से से इस दिशा में जो विषय सोच-विचार के दायरे में थी, वे अब धरातल पर आकार लेते नजर आ रहे हैं। इनमें सबसे बड़ा कदम है, बॉर्डर टूरिज्म का विकास। केंद्र और राज्य सरकारों ने साझा तौर पर इस जरूरत को महसूस किया और परिणामस्वरूप लाखों रुपए की लागत से तनोटराय देवी मंदिर से बमुश्किल 18 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित बबलियानवाला सीमा चौकी पर निर्माण कार्य करवाए गए हैं। इस पोस्ट को आम पर्यटकों के लिए खोलने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय पर्याप्त गंभीर है। अभी पिछले दिनों ही केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह एक दिन के अचानक दौरे पर जैसलमेर की यात्रा पर आए तो उन्होंने तनोटराय मंदिर परिसर में पर्यटन सेंटर की आधारशिला रख दी। आने वाले दिनों में जैसलमेर घूमने आने वाले सैलानियों का एक पूरा दिन भारत-पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर क्षेत्र का दिग्दर्शन करने में व्यतीत होगा। अमृतसर के पास वाघा बॉर्डर में दोनों देशों के बीच इस तरह की कवायद को देखने प्रतिवर्ष लाखों सैलानी उमड़ते ही हैं। आने वाले दिनों में सीमा-दर्शन जैसलमेर के पर्यटन के आसमान में चार चांद लगाने वाला निर्णय साबित होगा।

जैसाण की किस्मत ऐसे चमकी
कभी रेगिस्तान का बियाबान आज अगर चमचमाते सोनार नगर में तब्दील हुई है तो इसका बहुत सारा श्रेय पर्यटन को जाता है। इसकी शुरुआत भी दिलचस्प है। 1970 के दशक में कुछ विदेशी पेशेवर मरुस्थलीय जैसलमेर में तेल और गैस के अन्वेषण के कार्य के सिलसिले में आए। यहां आकर उन्हें तेल-गैस के भूगर्भीय भंडारों की थाह तो लगी, लेकिन उससे भी ज्यादा विस्मयपूर्ण और कला का बड़ा खजाना इस रेगिस्तानी शहर में स्थापत्य सौन्दर्य के तौर पर नजर आया। वे लोग अपने देश गए तथा राजस्थान के इस ‘अजूबा’ शहर के बारे में बताया। धीरे-धीरे एक कारवां बनने लगा और आज जैसलमेर वर्तमान में पर्यटन क्षितिज पर पुख्ता पहचान बना चुका है। वहीं देशी पर्यटन को बढ़ावा देने में विख्यात बांग्ला फिल्मकार सत्यजीत रे की सोनार किला फिल्म का बहुत बड़ा योगदान है। इस फिल्म की लगभग शूटिंग जैसलमेर दुर्ग में हुई। जिसे देखने के बाद बंगाली सैलानी स्वर्णनगरी आने लगे। धीरे-धीरे गुजरात व अन्य राज्यों के पर्यटक भी इस अजूबा शहर की तरफ उन्मुख हुए।

पर्यटन स्थलों का हो विकास
- जैसलमेर के विख्यात सोनार दुर्ग की नींव को मजबूत बनाने से लेकर वहां आने वाले लाखों सैलानियों की सुविधा के मद्देनजर 10 करोड़ रुपए पूर्ववर्ती वसुंधरा सरकार ने मंजूर किए थे। उनका उपयोग अब तक नहीं हो पाया है।
- सोनार दुर्ग में आवाजाही के लिए एकमात्र रास्ता है। बम्पर भीड़ वाले दिनों में यहां स्थानीय बाशिंदों के साथ सैलानियों के भगदड़ का शिकार होने की आशंका भी गहरा जाती है। ऐसे में पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को जिद छोडकऱ सोनार दुर्ग के लिए वैकल्पिक मार्ग निर्माण का मार्ग प्रशस्त करवाना चाहिए। इसके लिए सैद्धांतिक तौर पर तकनीकी पहलुओं पर भी पर्याप्त विचार हो चुका है।
- शहर के ऐतिहासिक गड़ीसर सरोवर में केंद्रीय मद से राशि मिलने के बाद पर्यटन विभाग ने करोड़ों की लागत से रात के समय लाइट एंड साउंड शो का आगाज कर दिया। इस शो का प्रचार-प्रसार और उसकी नियमितता को बनाए रखने की जरूरत है।
- गड़ीसर की आगोर का विस्तारीकरण तो गत वर्षों में कर दिया गया लेकिन कई कारणों से वहां प्रस्तावित विकास कार्य अब तक शुरू भी नहीं हो पाए हैं। अगर गड़ीसर का ही पूर्णतया विकास कर दिया जाए तो यह सैलानियों के लिए दिनभर व्यतीत करने का स्थान बन सकता है।
- जैसलमेर की ऐतिहासिक सालमसिंह की हवेली जर्जर हो रही है। उसकी तरफ सरकार व प्रशासन का कोई ध्यान नहीं है।
- कलात्मक पटवा हवेलियों को देखने लाखों पर्यटक आते हैं। इनके रखरखाव की तरफ भी पर्याप्त ध्यान होना चाहिए।
- जैसलमेर शहर सहित जिलेभर में सैकड़ों साल प्राचीन कला-संस्कृति के नमूने बिखरे हुए हैं। इसी तरह से जियोलॉजिकल पर्यटन की यहां अकूत संभावनाओं के बावजूद जिम्मेदार जागे नहीं हैं। जिसके चलते धरोहरों के नष्ट होने का खतरा बना रहता है।
- सम सेंड ड्यून्स की तर्ज पर खुहड़ी को सैलानियों की आवभगत के लिए तैयार करना होगा। इसके लिए सबसे जरूरी है, जैसलमेर से म्याजलार तक भारतमाला प्रोजेक्ट का स्वीकृत सडक़ निर्माण कार्य जल्द से जल्द पूर्ण करवाया जाए।

इस तरफ भी हो ध्यान
- जैसलमेर के पर्यटन को लपकावृत्ति ने सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। जोधपुर व बाड़मेर मार्ग से जैसलमेर आने वाले सैलानियों के लिए लपका तत्व दु:स्वप्न साबित होते हैं। उनके अलावा जैसलमेर से सम जाने वाले मार्ग में भी लपकों का आतंक बेतहाशा बढ़ गया है।
- जैसलमेर में सिविल एयरपोर्ट की सुविधा के बावजूद सालभर में केवल पांच माह ही हवाई सेवाओं की उपलब्धता चिंता का सबब बनी हुई है। जिम्मेदारों को कोशिश करनी होगी कि कम से कम जयपुर, अहमदाबाद और दिल्ली के लिए वर्ष पर्यंत हवाई सेवा मुहैया हो।
- कोरोना काल के बाद जैसलमेर से इंटरसिटी ट्रेन, हावड़ा एक्सप्रेस छिन गई। जबकि आज जरूरत है, जैसलमेर से देश के तमाम बड़े शहरों के लिए लम्बी दूरी की ट्रेनों की।
- कुछ टे्रनों के आने-जाने का समय बड़ा बेतुका है। इसमें भी सुधार की पूरी गुंजाइश है।

फैक्ट फाइल -
- 1156 में हुई जैसलमेर नगर की स्थापना
- 1970 के दशक में पर्यटन की शुरुआत
- 03 जिलों से सीधा जुड़ा है जैसलमेर
- 470 किलोमीटर लम्बी सीमा पाकिस्तान से जुड़ी
- 2000 करोड़ तक पहुंच सकता है पर्यटन व्यवसाय

उज्ज्वल है भविष्य
जैसलमेर पर्यटन का भविष्य बहुत उज्जवल है, इसमें दोराय नहीं। जैसलमेर के पर्यटन को और आगे बढ़ाने के लिए शासन-प्रशासन के साथ पर्यटन से जुड़े लोगों को सामूहिक जिम्मेदारी के भाव से कार्य करना होगा। हम हरसंभव सहयोग के लिए तैयार हैं।
- कैलाश व्यास, अध्यक्ष, सम कैम्प एंड रिसोट्र्स वेलफेयर सोसायटी

स्वच्छ पर्यटन का लक्ष्य
देश और दुनिया में जैसलमेर का नाम अग्रणी पर्यटन स्थलों में शामिल हो चुका है। अब हमारा लक्ष्य यहां के पर्यटन को हर तरीके से स्वच्छ बनाने का होना चाहिए। ऐसा होने पर पर्यटकों की आवक स्वत: और बढ़ेगी।
- मयंक भाटिया, होटल व्यवसायी, जैसलमेर