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Jaisalmer: देश का करीब 29.77 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र भूमि क्षरण एवं मरुस्थलीकरण से प्रभावित

देश में भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण का दायरा चिंताजनक स्तर पर बना हुआ है, जिसका असर पश्चिमी राजस्थान के शुष्क जिलों पर भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है। इसरो के नवीनतम डेजर्टिफिकेशन एंड लैंड डिग्रेडेशन एटलस (2018–19) के अनुसार भारत का 29.77 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र इस समस्या से प्रभावित है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन, अनियोजित भूमि उपयोग और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच प्रभावी संरक्षण उपायों की जरूरत पहले से अधिक बढ़ गई है।
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पश्चिमी राजस्थान में वायु अपरदन से प्रभावित रेतीला भू-भाग।

जैसलमेर. देश में भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण की चुनौती लगातार बनी हुई है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर की ओर से प्रकाशित डेजर्टिफिकेशन एंड लैंड डिग्रेडेशन एटलस ऑफ इंडिया (2018–19) के अनुसार भारत के कुल 328.72 मिलियन हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्र का 29.77 प्रतिशत, यानी 97.85 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र भूमि क्षरण एवं मरुस्थलीकरण की संयुक्त श्रेणी से प्रभावित है। यह आकलन उपग्रह आधारित मानचित्रण एवं जियोस्पेशियल विश्लेषण पर आधारित है। यह इसरो का अब तक का नवीनतम राष्ट्रीय एटलस (2018–19) है, क्योंकि इसके बाद का कोई अद्यतन संस्करण अभी तक जारी नहीं हुआ है।

15 वर्षों में 3.32 मिलियन हेक्टेयर बढ़ा प्रभावित क्षेत्र

रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2003–05 में देश का 94.53 मिलियन हेक्टेयर (28.76 प्रतिशत) क्षेत्र भूमि क्षरण एवं मरुस्थलीकरण से प्रभावित था। वर्ष 2011–13 में यह बढ़कर 96.40 मिलियन हेक्टेयर (29.32 प्रतिशत) हो गया, जबकि वर्ष 2018–19 में यह 97.85 मिलियन हेक्टेयर (29.77 प्रतिशत) तक पहुंच गया। इस प्रकार 15 वर्षों में लगभग 3.32 मिलियन हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र इस श्रेणी में शामिल हुआ।

जल अपरदन प्रमुख कारण, पश्चिमी राजस्थान में वायु अपरदन गंभीर

इसरो के अनुसार देश में भूमि क्षरण के प्रमुख प्रक्रियात्मक कारणों में जल अपरदन सबसे बड़ा कारण है, जो लगभग 11.01 प्रतिशत क्षेत्र को प्रभावित करता है। इसके बाद वनस्पति क्षरण (9.15 प्रतिशत) तथा वायु अपरदन (5.46 प्रतिशत) का स्थान आता है।

पश्चिमी राजस्थान के शुष्क क्षेत्र, विशेषकर जैसलमेर, बाड़मेर और बीकानेर, वायु अपरदन से प्रभावित जिलों में शामिल हैं। तेज हवाओं के कारण उपजाऊ मिट्टी का निरंतर क्षरण कृषि उत्पादन, चारागाहों, वनस्पति आवरण और पारिस्थितिक संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार इस क्षेत्र में हरित आवरण बढ़ाने, चारागाह विकास, जल संरक्षण एवं टिकाऊ प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

वैश्विक स्तर पर भी बढ़ रही चिंता

संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय यानी यूएनसीसीडी के अनुसार वर्ष 2015 से 2019 के बीच विश्व में प्रतिवर्ष औसतन लगभग 100 मिलियन हेक्टेयर भूमि क्षरण दर्ज किया गया। इसका सीधा प्रभाव खाद्य सुरक्षा, जल संसाधनों, जैव विविधता और करोड़ों लोगों की आजीविका पर पड़ रहा है।

2030 तक पुनर्स्थापन लक्ष्य, भारत की प्रगति उल्लेखनीय

भारत ने लैंड डिग्रेडेशन न्यूट्रैलिटी, एलडीएन और बॉन चैलेंज के तहत वर्ष 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर क्षरित भूमि के पुनर्स्थापन का लक्ष्य निर्धारित किया है। सरकारी आकलनों के अनुसार वर्ष 2011 से 2020 के बीच लगभग 21.76 मिलियन हेक्टेयर क्षरित एवं वनविहीन भूमि का पुनर्स्थापन किया गया है। यह प्रगति लक्ष्य का लगभग 83–84 प्रतिशत के बराबर है।

प्रमुख आंकड़े

328.72 मिलियन हेक्टेयर — भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्र

97.85 मिलियन हेक्टेयर (29.77%) — भूमि क्षरण एवं मरुस्थलीकरण प्रभावित क्षेत्र

94.53 मिलियन हेक्टेयर (2003–05)

96.40 मिलियन हेक्टेयर (2011–13)

97.85 मिलियन हेक्टेयर (2018–19)

लगभग 3.32 मिलियन हेक्टेयर — 15 वर्षों में वृद्धि

11.01% — जल अपरदन (प्रमुख प्रक्रिया)

9.15% — वनस्पति क्षरण

5.46% — वायु अपरदन

लगभग 100 मिलियन हेक्टेयर/वर्ष — यूएनसीसीडी वैश्विक अनुमान (2015–2019)

26 मिलियन हेक्टेयर — भारत का 2030 पुनर्स्थापन लक्ष्य

21.76 मिलियन हेक्टेयर — अब तक पुनर्स्थापित क्षेत्र

लगभग 84% — लक्ष्य के मुकाबले प्रगति