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जैसलमेर: युवाओं की थाली में लौटा थार का स्वाद

थार की तपती गर्मियों में शरीर को राहत देने वाले पारंपरिक व्यंजन अब केवल बुजुर्गों की थाली तक सीमित नहीं हैं।

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थार की तपती गर्मियों में शरीर को राहत देने वाले पारंपरिक व्यंजन अब केवल बुजुर्गों की थाली तक सीमित नहीं हैं। जैसलमेर के युवा पीढ़ी ने इन व्यंजनों को न केवल अपनाया है, बल्कि सोशल मीडिया के ज़रिए इन्हें नए रंग-रूप में दुनिया के सामने भी रखा है। काचरी की चटनी, कैर सांगरी, कैरी पाना, छाछ की बाटी, ज्वार की रोट, बेलपत्ता व आम के शर्बत जैसे व्यंजन अब इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब वीडियो का हिस्सा बन रहे हैं।स्थानीय युवती भूमिका भाटी बताती हैं कि पहले हमें लगता था ये व्यंजन पुराने जमाने के हैं, लेकिन जब गर्मी में शरीर थकता है, तब समझ में आता है कि दादी-नानी की रसोई ही असली ताकत है। अब हम खुद बनाते हैं और दोस्तों को भी खिलाते हैं।

खानपान विशेषज्ञों की राय

आयुर्वेदाचार्य डॉ. हरिराम बोथरा का कहना है कि थार क्षेत्र में गर्मी और लू से लडऩे के लिए परंपरागत व्यंजनों की रचना पीढिय़ों के अनुभव से हुई है। काचरी, बेल, छाछ, कैर, सांगरी आदि शीतल व पाचनवर्धक तत्व हैं। जब युवा इन्हें अपनाते हैं तो न केवल शरीर को लाभ होता है, बल्कि संस्कृति भी संरक्षित रहती है।
फूड एक्सपर्ट वंदना व्यास कहती हैं कि फास्ट फूड और कोल्ड ड्रिंक के युग में देसी व्यंजन ही शुद्धता और पोषण के आधार हैं। गर्मियों में ज्वार की रोट और रायता न केवल कूलिंग एफेक्ट देते हैं, बल्कि डाइजेस्टिव सिस्टम को दुरुस्त रखते हैं। स्थानीय होटलों और कैफे में अब ग्रीष्मकालीन थाली का चलन शुरू हो गया है, जिसमें जैसलमेर के गर्मियों के देसी व्यंजन परोसे जा रहे हैं।

सांस्कृतिक जुड़ाव को मिल रही ताकत

सामाजिक विश्लेषक डॉ. लक्ष्मणसिंह के अनुसार जब युवा अपनी जड़ों से जुड़ते हैं, तो संस्कृति जीवित रहती है। जैसलमेर के खानपान को लेकर युवाओं की यह पहल समाज के लिए सकारात्मक संकेतमानी जा सकती है।