
कच्छ-भुज से मां आशापूर्णा ने परमाणु नगरी आकर किया निवास
पोकरण. परमाणु नगरी का जितना ऐतिहासिक व सामरिक महत्व है, उतना ही धार्मिक महत्व भी है। क्षेत्र में बड़ी संख्या में विभिन्न देवी देवताओं के मंदिर स्थित है। कस्बे के चारों तरफ नजर डालें, तो यहां आधा दर्जन से अधिक देवी मंदिर स्थित है। यहां वर्षभर श्रद्धालुओं का तांता लगता ही है, नवरात्र के दौरान यहां भीड़ और भी बढ़ जाती है। इन्हीं मंदिरों में कस्बे का सर्वाधिक प्रसिद्ध मंदिर आशापूर्णा देवी का ऐतिहासिक मंदिर है। यहां पोकरण ही नहीं बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर, फलोदी, बाड़मेर आदि क्षेत्रों से सैंकड़ों की संख्या में प्रतिदिन श्रद्धालु आकर दर्शन करते है। पुष्करणा ब्राह्मण समाज के बिस्सा, स्वर्णकार समाज, खींची राजपूत, माहेश्वरी टावरी जाति की कुलदेवी आशापूर्णा का मंदिर कस्बे से पश्चिम की ओर तीन किमी दूर एक समतल पठारी भूमि पर स्थित है। इस मंदिर की स्थापना विक्रम संवत् 1315 में माघ शुक्ला तृतीया के दिन देवी के अनन्य भक्त रुद्रनगर लोद्रवा निवासी लूणभानू बिस्सा के करकमलों से की गई।
यह है ऐतिहासिक मान्यता
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार लूणभानू बिस्सा अपनी कुलदेवी आशापूर्णा के अनन्य भक्त थे, जो प्रतिवर्ष गुजरात प्रांत के कच्छ क्षेत्र में स्थित आशापूर्णा मंदिर दर्शनों के लिए जाते थे। जब वे वृद्ध हुए, तब उन्होंने मां आशापूर्णा से पुन: आने में असमर्थता जताते हुए क्षमा मांगी, तभी देवी ने अपने भक्त की पुकार सुनकर कहा वे उसकी भक्ति से प्रसन्न है तथा जो इच्छा हो, वरदान मांगो। उन्होंने कहा कि मैं अपने शेष जीवन में भी आपके चरणों की सेवा करना चाहता हूं, ताकि मैं अपना अंतिम समय भी आपके चरणों में समर्पित कर सकूं। मां आशापूर्णा ने उन्हें वरदान दिया कि वह उसके साथ रुद्रनगर चलेगी, लेकिन तुम रास्ते में किसी भी दशा में पीछे मुड़कर मत देखना। जिस समय यह दशा भंग होगी, वे उसी स्थान पर रुक जाएगी। इसी शर्त के अनुसार कच्छ से रुद्रनगर जाते समय पोकरण से तीन किमी दूर पश्चिम दिशा में भक्त बिस्सा को ठहर माता ऐसा शब्द सुनाई दिया, तब उन्होंने अनायास पीछे मुड़कर देखा, तो मां आशापूर्णा देवी ने कहा कि तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है। इसलिए अब मैं यहां से आगे नहीं बढ़ सकती तथा इतना कहकर मां आशापूर्णा भूमि में प्रविष्ट हो गई। उस जगह पर उनका एक दुपट्टा बाहर पड़ा था। उसी स्थान पर उन्होंने मां आशापूर्णा देवी के मंदिर का निर्माण करवाया तथा समय के साथ-साथ उसका विकास आगे बढ़ता रहा।
श्रद्धालुओं के ठहरने व भोजन की है पर्याप्त व्यवस्था
आशापूर्णा माता मंदिर कस्बे से तीन किमी दूर होने के कारण यहां आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधाओं व बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए ठहरने व भोजन की पर्याप्त व्यवस्था की गई है। मंदिर परिसर में दो दर्जन से अधिक कमरे, एक बड़ा हॉल स्थित है। स्थानीय मंदिर ट्रस्ट की ओर से मंदिर के पूर्व दिशा में एक धर्मशाला का निर्माण करवाया गया है। जिसमें ठहरने की पर्याप्त व्यवस्था व सुविधाओं का विकास किया गया है। इसी प्रकार मंदिर के ठीक सामने उत्तर की तरफ आशापुरा धर्मशाला ट्रस्ट बीकानेर की ओर से दो मंजिला विशाल धर्मशाला का भी निर्माण करवाया गया है। जिसमें करीब 50-60 कमरों में ठहरने, भोजन व गौशाला की व्यवस्था की गई है। यहां प्रतिदिन सैंकड़ों श्रद्धालु आकर दर्शन करते है तथा पोकरण कस्बे के निवासियों के लिए यह एक प्राकृतिक पिकनिक स्थल भी है। वर्ष में तीन बार चैत्र, आसोज व महिने में यहां भव्य मेले लगते है। जिसमें हजारों की संख्या में यात्री दर्शनार्थ पहुंचकर अमन, चैन, खुशहाली के लिए प्रार्थना करते है।
Published on:
23 Oct 2020 08:17 pm
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