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एनआरसीसी विशेषज्ञ टीम जैसलमेर पहुंची, ऊंटों की बीमारी की पहचान व उपचार शुरू

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर की विशेषज्ञ टीम जैसलमेर जिले के ग्राम सांवता पहुंची, जहां ऊंटों में फैली बीमारी की पहचान और उपचार के लिए पशु स्वास्थ्य शिविर-सह-कृषक-वैज्ञानिक संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया।

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  • पशु स्वास्थ्य शिविर में 1348 पशुओं की जांच, ऊंटों पर फोकस
  • रक्त नमूने, टीकाकरण और दवाइयों से ऊंटों में फैले रोग पर नियंत्रण

जैसलमेर. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर की विशेषज्ञ टीम जैसलमेर जिले के ग्राम सांवता पहुंची, जहां ऊंटों में फैली बीमारी की पहचान और उपचार के लिए पशु स्वास्थ्य शिविर-सह-कृषक-वैज्ञानिक संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह आयोजन भारत सरकार की अनुसूचित जाति उप-योजना के अंतर्गत किया गया।
शिविर में ग्राम सांवता के लगभग 100 पशुपालकों ने सहभागिता की। इस दौरान ऊंट 420, गाय 279 तथा भेड़-बकरी 649 सहित कुल 1348 पशुओं की स्वास्थ्य जांच और उपचार किया गया। कार्यक्रम में महिलाओं की सहभागिता उल्लेखनीय रही।
विशेषज्ञ टीम ने ऊंटों में फैले रोग की पहचान के लिए रक्त नमूने एकत्र किए। इसके साथ ही सर्रा रोग की रोकथाम और उपचार के लिए आवश्यक टीकाकरण किया गया। जांच के दौरान कई पशुओं में चीचड़ संक्रमण और सर्दी से संबंधित सामान्य रोग पाए गए, जिनका मौके पर उपचार किया गया।
केन्द्र निदेशक डॉ. अनिल कुमार पूनिया ने पशुपालकों को अनुसूचित जाति उप-योजना का अधिक लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि आधुनिक पशुपालन तकनीकों को अपनाकर पशुधन से उत्पादन और आय दोनों बढ़ाई जा सकती है। उन्होंने शोध निष्कर्षों के आधार पर बताया कि ऊंटनी के दूध में औषधीय गुण पाए जाते हैं, जो मधुमेह, टीबी और ऑटिज़्म जैसे रोगों के प्रबंधन में सहायक माने जाते हैं।
डॉ. पूनिया ने जैसलमेर को ऊंट-बहुल क्षेत्र बताते हुए ऊंटनी दुग्ध आधारित उद्यमिता की व्यापक संभावनाओं की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने पर्यटन में ऊंटों की भूमिका और ऊंटनी दूध से बने मूल्य-संवर्धित उत्पादों को पशुपालकों के लिए स्थायी आय का सशक्त माध्यम बताया। केन्द्र के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. राकेश रंजन ने कहा कि पशुधन ग्रामीण जीवन की रीढ़ है। वैज्ञानिक डॉ. श्याम सुंदर चौधरी ने सर्दी के मौसम में पशुओं की देखभाल पर जोर देते हुए संतुलित आहार, स्वच्छ बिछावन, ठंड से बचाव और नियमित स्वास्थ्य परीक्षण की आवश्यकता बताई। उन्होंने सर्दियों में होने वाले रोगों, थनैला जैसी समस्याओं की समय पर रोकथाम और उपचार को जरूरी बताया। पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. काशीनाथ ने बताया कि शिविर में लाए गए अधिकांश पशुओं में चीचड़ संक्रमण और शीत ऋतु से जुड़े रोग पाए गए। इनके नियंत्रण के लिए दवाइयां दी गईं तथा खनिज पूर्ति हेतु नमक की ईंटें और केन्द्र निर्मित करभ पशु आहार वितरित किया गया।
कार्यक्रम में प्रगतिशील पशुपालक और देगराय उष्ट्र संरक्षण समिति के अध्यक्ष सुमेर सिंह ने ऊंट पालकों के हित में किए जा रहे प्रयासों के लिए आभार जताया। एससीएसपी उप-योजना के नोडल अधिकारी मंजीत सिंह ने योजना के उद्देश्य और लाभों की जानकारी दी। वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी अखिल ठुकराल और वित्त एवं लेखा अधिकारी आशीष पित्ती ने पशुपालकों को उपलब्ध सुविधाओं पर प्रकाश डाला। शिविर के संचालन में राजेश चौधरी और हरजिंदर ने पंजीयन, उपचार और आहार वितरण में सक्रिय भूमिका निभाई।