
जैसलमेर. सरकारी ज़मीन में अवैध कब्जों को लेकर समयबद्ध निगरानी की है दरकार।
जैसलमेर. केस-1: शहर से सटे क्षेत्र में वर्षों पहले सरकारी जमीन पर एक अस्थायी झोंपड़ी बनाई गई। कुछ समय बाद चारदीवारी खड़ी हुई, फिर आसपास कई और कब्जे हो गए। आज उसी क्षेत्र में छोटे-छोटे प्लॉट लाखों रुपए में बेचे जाने की चर्चा है, जबकि जमीन आज भी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है।
केस-2: एक सरकारी भूखंड पर पहले घुमंतु परिवार को बसाया गया। बाद में उसी कब्जे को आधार बनाकर निजी स्टांप और रसीद के जरिए कई बार हाथ बदले गए। कब्जा बदलता रहा, लेकिन सरकारी अभिलेखों में स्वामित्व कभी नहीं बदला।
केस-3: प्रस्तावित सड़क के पास खाली सरकारी जमीन पर पहले सीमांकन किया गया। आसपास बिजली और आबादी बढ़ी तो भूखंड की कीमत कई गुना बढ़ गई। इसके बाद अनधिकृत प्लॉटिंग शुरू हुई और खरीदारों को भविष्य में नियमितीकरण का भरोसा देकर सौदे किए गए।
पर्यटन, रक्षा गतिविधियों और तेजी से फैलते शहरी विस्तार ने जैसलमेर की जमीन को प्रदेश की सबसे महंगी परिसंपत्तियों में शामिल कर दिया है। शहर और आसपास दस किलोमीटर के दायरे में एक फीट जमीन भी लाखों रुपए के मूल्य की मानी जाती है। इसी बढ़ती कीमत ने सरकारी जमीन पर कब्जों को केवल अतिक्रमण नहीं रहने दिया, बल्कि करोड़ों रुपए के समानांतर भूमि बाजार में बदल दिया है। सरकारी रिकॉर्ड में स्वामित्व जस का तस रहता है, लेकिन कब्जे का दावा और उसका लेन-देन लगातार हाथ बदलता रहता है। जानकार बताते हैं कि अधिकांश कब्जे किसी एक दिन नहीं होते। पहले ऐसे सरकारी भूखंड तलाशे जाते हैं जहां निगरानी कम हो, सीमांकन स्पष्ट नहीं हो या लंबे समय से सरकारी उपयोग नहीं हुआ हो। वहां अस्थायी झोंपड़ी, टीनशेड या चारदीवारी खड़ी की जाती है। कुछ समय बाद आसपास अन्य निर्माण शुरू हो जाते हैं और पूरा क्षेत्र धीरे-धीरे बसावट का स्वरूप लेने लगता है। इसके बाद छोटे-छोटे प्लॉट तय कर अनौपचारिक खरीद-फरोख्त शुरू हो जाती है।
जांच से जुड़े जानकार बताते हैं कि कई मामलों में भूमाफिया स्वयं सामने नहीं आता। इसके बजाय घुमंतु परिवारों या आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को डमी कब्जाधारी बनाकर सरकारी भूमि पर बैठाया जाता है। बाद में यही कब्जा भविष्य के स्वामित्व का आधार बताकर लाखों रुपए में बेचने की कोशिश होती है। शहर ही नहीं बल्कि इससे सटे अमरसागर, मूलसागर, बड़ाबाग और अन्य विकसित होते क्षेत्रों में भी समय-समय पर सरकारी भूमि पर अतिक्रमण और अनधिकृत बसावट के मामले सामने आते रहे हैं। जहां सड़क, बिजली, पानी और आबादी पहुंचती है, वहां कब्जे वाली जमीन का बाजार मूल्य भी तेजी से बढ़ने लगता है। इसी उम्मीद पर अवैध प्लॉटिंग का कारोबार फलता-फूलता है।
-खाली सरकारी भूमि की पहचान
-अस्थायी कब्जा या सीमांकन
-डमी कब्जाधारी बैठाना
-आसपास बसावट बढ़ाना
-छोटे प्लॉट तैयार करना
-खरीदार तलाशना
-निजी रसीद, स्टांप या एग्रीमेंट पर सौदे
-कीमत बढ़ने का इंतजार
-कब्जा आगे बेच देना
इन सौदों में पंजीकृत विक्रय पत्र नहीं होते। साधारण रसीद, गैर-पंजीकृत स्टांप, निजी एग्रीमेंट या गवाहों के हस्ताक्षर वाले दस्तावेजों के आधार पर लेन-देन होता है। खरीदार भविष्य में नियमितीकरण या वैधता मिलने की उम्मीद में निवेश करता है, जबकि कानूनी रूप से उसे किसी प्रकार का स्वामित्व अधिकार प्राप्त नहीं होता।
-मुख्य सड़क से दूरी
-बिजली और पानी की उपलब्धता
-आसपास बढ़ती आबादी
-पर्यटन गतिविधियों का विस्तार
-भविष्य में नियमितीकरण की संभावना
-नए विकास कार्यों की घोषणा
इस समानांतर बाजार से सरकारी भूमि सिकुड़ती है, सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए जमीन कम पड़ती है, सड़क, पार्क, स्कूल, अस्पताल जैसी योजनाएं प्रभावित होती हैं। शहर का नियोजित विकास बाधित होता है और अंततः अवैध जमीन खरीदने वाले लोग भी वर्षों तक कानूनी विवादों में उलझे रहते हैं।
सरकारी भूमि पर अतिक्रमण नहीं करने की हिदायत दी गई है। परिषद ने हाल ही म्याजलार रोड, हवाई अड्डा रोड, तोताराम की ढाणी, सुदासर और बाड़मेर बाईपास रोड पर अवैध रूप से बेची गई राजकीय आबादी भूमि पर किए गए अतिक्रमण हटाए हैं। इन क्षेत्रों में बिना वैधानिक दस्तावेजों के भूमि का बेचान किया गया था, जिसे कई लोगों ने खरीदा भी था। इससे पूर्व तोताराम की ढाणी और म्याजलार रोड पर भी परिषद स्वामित्व की भूमि से अतिक्रमण हटाए गए थे। आमजन किसी भी भूमाफिया के बहकावे में आकर राजकीय भूमि की खरीद-फरोख्त न करें। जिन लोगों ने स्थायी या अस्थायी अतिक्रमण किए हैं, उन्हें हटाया जाएगा।
-लजपालसिंह, आयुक्त, नगरपरिषद जैसलमेर
Updated on:
08 Jul 2026 08:07 pm
Published on:
08 Jul 2026 08:07 pm
