
नशे की गिरफ्त में बाड़मेर-जैसलमेर (पत्रिका फाइल फोटो)
Rajasthan News: राजस्थान के सीमावर्ती रेगिस्तानी जिले बाड़मेर-जैसलमेर अब एक खतरनाक मोड़ पर खड़े हैं। जहां कभी तस्करी सीमित स्तर पर थी। वहीं, अब सुनसान धोरों और ढाणियों में सिंथेटिक ड्रग एमडी (मेफेड्रोन) की अवैध फैक्ट्रियां पकड़े जाना बड़े नेटवर्क की ओर इशारा करता है।
बाड़मेर में पिछले सात महीनों में लगातार हुई कार्रवाई में सामने आया है कि रेगिस्तान अब सिर्फ ट्रांजिट रूट नहीं, बल्कि ड्रग्स मैन्युफैक्चरिंग हब बनता जा रहा है। यदि समय रहते कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो यह जाल युवाओं के भविष्य को पूरी तरह जकड़ सकता है।
रेगिस्तान की भौगोलिक स्थिति यह है कि कम आबादी, दूरदराज ढाणियां, सीमावर्ती क्षेत्र और पुलिस की सीमित पहुंच के बीच तस्करों के लिए मुफीद साबित हो रही है। कच्चे मकानों, टिनशेड और खेतों के बीच अस्थायी लैब बनाकर केमिकल से एमडी तैयार की जा रही है, जिसे बाद में बड़े शहरों में सप्लाई किया जाता है।
23 जुलाई 2025, धोलकिया (सेड़वा): 39 किलो 250 ग्राम मिश्रित तरल पदार्थ, 290 किलो 840 ग्राम केमिकल, 5 किलो 330 ग्राम पाउडर व उपकरण जब्त: 10 आरोपी गिरफ्तार।
19 दिसंबर 2025, केरली आदर्श चवा (सदर): 39 किलो 777 ग्राम एमडी, 99 किलो 931 ग्राम केमिकल; 2 आरोपी गिरफ्तार।
05 फरवरी 2026, भैरूड़ी (सेड़वा): 77 किलो 250 ग्राम केमिकल, 107 किलो 170 ग्राम पाउडर 1 आरोपी गिरफ्तार।
16 फरवरी 2026, सरहद खरड़ (धोरीमन्ना): 186 किलो 940 ग्राम केमिकल व उपकरण; आरोपी फरार।
22 फरवरी 2026, सरहद सिंहार (सेड़वा) : 4 किलो 73 ग्राम एमडी, 48 लीटर तरल केमिकल, 48 किलो 21 ग्राम पाउडर, 540 ग्राम डोडा पोस्त: 1 आरोपी गिरफ्तार।
23 फरवरी 2026, रोहिड़ियों का तला (चौहटन): 197 किलो 450 ग्राम केमिकल, 45 किलो पाउडर; 1 आरोपी गिरफ्तार।
एमडी जैसे ड्रग्स मानसिक संतुलन बिगाड़ने, आक्रामकता बढ़ाने और लंबे समय में गंभीर शारीरिक नुकसान का कारण बनते हैं। तस्कर स्थानीय युवाओं को मोटी कमाई का लालच देकर इस दलदल में धकेल रहे हैं। नतीजा यह है कि गिरफ्तारी, जेल और परिवारों का सामाजिक विघटन।
नशे पर नकेल कसने के लिए तस्करों के नेटवर्क पर प्रहार कर रहे हैं। बड़ी कार्रवाई भी की गई हैं। नशा न केवल स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि भविष्य और परिवार दोनों को प्रभावित करता है। खेल, शिक्षा और सामाजिक कार्यों में भागीदारी से व्यक्तित्व का विकास होता है। राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है, इसलिए उन्हें जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़कर समाज में सकारात्मक बदलाव लाना चाहिए।
-अभिषेक शिवहरे, एसपी, जैसलमेर
बाड़मेर में ड्रग्स का यह बढ़ता जाल केवल अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक ढांचे को तोड़ने की साजिश है। इसे जड़ से खत्म करने के लिए कठोर और निरंतर कार्रवाई जरूरी है।
- ठाकराराम माली, जनप्रतिनिधि
सीमावर्ती जिलों में तकनीक आधारित निगरानी और स्थानीय लोगों की भागीदारी के बिना इस नेटवर्क को तोड़ना संभव नहीं है। सरकार को दोनों स्तरों पर काम करना होगा।
- रघुवीरसिंह तामलोर, सामाजिक कार्यकर्ता
युवाओं को रोजगार, शिक्षा और स्किल से जोड़ना ही सबसे प्रभावी समाधान है, अन्यथा वे तस्करों के आसान शिकार बनते रहेंगे।
- रमेशसिंह इंदा, जनप्रतिनिधि
नशा तस्करों को किसी भी स्तर पर राजनीतिक या सामाजिक संरक्षण नहीं मिलना चाहिए, इसके लिए जीरो टॉलरेंस नीति लागू होनी चाहिए।
-नरपतसिंह राजपुरोहित, पर्यावरण प्रेमी
परिवारों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी, बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखना अब जरूरी हो गया है।
- भूराराम गोदारा, पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष
रेगिस्तान का ऊर्जा हृदय, विकास की नई धड़कन रेगिस्तान के एक छोर पर बसा भारत-पाकिस्तान सीमा से सटा बाड़मेर जिला अपनी अनूठी पहचान रखता है। मालानी के नाम से विख्यात यह क्षेत्र आज विश्व पटल पर ऊर्जा क्षेत्र का प्रमुख केंद्र बन चुका है। 1990 के दशक में 'काला पानी' कहलाने वाला यह जिला अब पेट्रोलियम, तेल, गैस, कोयला, लिग्नाइट की खदानों के साथ साथ सोलर और विंड ऊर्जा का गढ़ है।
बाड़मेर में तेल कंपनियों के आने के बाद विकास तो हुआ, लेकिन नशे की समस्या ने युवाओं को बुरी तरह जकड़ लिया है। एनसीबी रिपोर्ट में बाड़मेर को नशे का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट बताया गया है, जहां एमडी, स्मैक और अन्य ड्रग्स युवाओं को बर्बाद कर रहे हैं। कैयर्न इंडिया, जीएसडब्ल्यू जैसी कंपनियों ने नौकरियां दीं, लेकिन अच्छे स्कूल स्टेडियम नहीं बनने से युवा गलत राह पर चले गए। 25-35 वर्ष के युवा सबसे अधिक प्रभावित हैं। श्मशान घाटों और वीरान जगहों पर नशे की महफिलें सज रही हैं।
पंजाब जैसी स्थिति बन रही, जहां बॉर्डर प्रभाव से नशा फैला। नशे पर अंकुश के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी है। सख्ती से कानूनी कार्रवाई की जाए। तस्करों को पहचानें, पुलिस उन्हें जेल भेजे। नशा मुक्त अभियान चलाएं। नशे की गिरफ्त में आए युवाओं को नशा मुक्ति केंद्र भेजें, उन्हें काउंसलिंग दी जाए।
इसके साथ ही शिक्षा-खेल को बढ़ावा दिया जाए। नए खेल मैदान, स्टेडियम बनाएं। युवाओं को खेलकूद और पढ़ाई में व्यस्त रखें ताकि नशे का समय ही न बचे। समाज और नेता भी अपनी भूमिका निभाएं। राजनेता जागरूकता अभियान चलाएं। छोटे बच्चों को सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ें। ये कदम अपनाकर बाड़मेर को नशामुक्त बनाया जा सकता है, वरना आने वाला समय और कठिन होगा।
रेगिस्तान की रेतीली खामोशी के पीछे एक डरावनी गूंज सुनाई सुनाई देने दे लगी है। यह गूंज ऊंटों के काफिले की नहीं, बल्कि उन अवैध फैक्ट्रियों की है जो हमारे युवाओं की रगों में सफेद मौत घोल रही हैं। थार के सीमावर्ती जिले बाड़मेर और जैसलमेर, जो पर्यटन, संस्कृति, ऊर्जा और रणभूमि में अपनी शूरवीरता के लिए जाने जाते है, आज ड्रग मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दहलीज पर खड़े हैं।
पिछले कुछ महीनों के आंकड़े ही रोंगटे खड़े करने वाले हैं। छह अवैध फैक्ट्रियां पकड़ी गई। सैकड़ों लीटर केमिकल बरामद हुआ। भारी मात्रा में एमडी मिली। यह महज संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश है।
तस्करों ने बाड़मेर की भौगोलिक परिस्थितियों का फायदा उठाया है। दूर-दराज की ढाणियां और सुनसान धोरे अब उनके लिए सुरक्षित ठिकाने बन गए है। जहां पुलिस की पहुंच सीमित है, वहां कच्चे मकानों और टिनशेड के नीचे मौत का सामान तैयार हो रहा है। हमारी सबसे बड़ी ताकत युवा शक्ति है, लेकिन आज वही शक्ति निशाने पर है।
रातों-रात अमीर बनने का सपना और गांव-गांव तक फैली सप्लाई चेन के कारण युवा आसानी से इस दलदल में फंस रहे हैं। तस्कर स्थानीय लड़कों को मोटी कमाई का लालच देकर अपने जाल में खींच रहे हैं।
यह केवल अपराध नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक संरचना पर सीधा हमला है। इसका परिणाम भी सामने है। मानसिक संतुलन खोते युवा, अपराध की राह पर बढ़ते कदम और उजड़ते परिवार बर्बादी की कहानी कह रहे हैं। बाड़मेर अब केवल तेल और कोयले की आग से नहीं तप रहा, बल्कि नशे की भट्टी में भी झुलस रहा है।
यदि आज नहीं जागे, तो कल बहुत देर हो जाएगी। केवल पुलिसिया कार्रवाई इस समस्या का समाधान नहीं है। इसके लिए बहुआयामी प्रहार करना होगा। सीमावर्ती इलाकों में ड्रोन और सेंसर आधारित हाईटेक निगरानी जरूरी है। जिन केमिकल्स से यह जहर तैयार हो रहा है, उनकी सप्लाई और आवाजाही की सख्त निगरानी हो।
नशा बेचने वालों को मिलने वाला राजनीतिक और सामाजिक संरक्षण तुरंत समाप्त होना चाहिए। युवाओं को केवल डिग्री नहीं, बल्कि कौशल, रोजगार और खेल के मैदान चाहिए। खाली दिमाग ही तस्करों की सबसे आसान प्रयोगशाला बनता है। पंजाब की स्थिति हमारे सामने है। बाड़मेर भी उसी रास्ते पर बढ़ता दिखाई दे रहा है। तेल और गैस ने इस मिट्टी को समृद्धि दी है, लेकिन नशे का यह काला कारोबार सब कुछ राख कर सकता है। अब परिवारों को भी जागना होगा।
हर मां-बाप को अपने बच्चों की बदलती आदतों, संगत और व्यवहार पर नजर रखनी होगी। यह लड़ाई केवल पुलिस और तस्करों के बीच नहीं है। यह लड़ाई बाड़मेर के भविष्य और सफेद जहर के बीच है। प्रशासन को सख्ती दिखानी होगी, समाज को साथ आना होगा। थार को बचाना ही होगा।
नसीब को जगाने के लिए अब जागना होगा, ये थार की मिट्टी है, इसे जहर से बचाना होगा। बर्बाद न हो जाए जवानी इस सफेद धुएं में, कल की खातिर, आज ही हमें लड़ना होगा।
सीमावर्ती जिलों में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति अब गंभीर सामाजिक चुनौती बन चुकी है। पर्यटन और सामरिक महत्व के लिए पहचान रखने वाला जैसलमेर और ऊर्जा क्षेत्र में पहचान बनाने वाला बाड़मेर अब नशे के फैलते जाल के कारण चिंता में है। गांवों, ढाणियों और शहरी इलाकों तक नशे की पहुंच ने युवाओं के भविष्य पर संकट खड़ा कर दिया है।
सीमा से जुड़े भौगोलिक हालात तस्करों के लिए अवसर बनते जा रहे हैं। अफीम, स्मैक, चरस, एमडी और नशीली गोलियों की खेप तस्करी के जरिए जिले में पहुंच रही है, जिसे स्थानीय नेटवर्क गांव-गांव तक फैला रहे हैं।
नशे से जुड़े मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज हो रही है, वहीं रोजगार की कमी और आसान पैसे का लालच युवाओं को इस दलदल में धकेल रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में नशा तस्करों का नेटवर्क बेखौफ नजर आ रहा है। पैकेट में बिक्री और उधार में नशा देने जैसी गतिविधियां सामने आ रही है।
समाज का बड़ा वर्ग डर और बदनामी के कारण चुप्पी साधे हुए है, जिससे समस्या और गहराती जा रही है। एक समय खेल और मेहनत से जुड़े रहने वाले युवा अब नशे की ओर भटक रहे हैं। इसका असर पढ़ाई, स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन पर पड़ रहा है। चोरी, मारपीट और 15 से 30 वर्ष आयु वर्ग सबसे अधिक प्रभावित है। जागरूकता, काउंसलिंग, खेल गतिविधियां और रोजगार के अवसर बढ़ाकर ही इस संकट पर प्रभावी नियंत्रण संभव है।
Published on:
31 Mar 2026 02:20 pm
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