
मरुस्थल का शांत प्रहरी गोडावण...जिसकी हर उड़ान संरक्षण की उम्मीदें बढ़ा रही है।
थार के धोरों पर कभी सामान्य दृश्य माने जाने वाला गोडावण अब भारत की सबसे गंभीर वन्यजीव संरक्षण चुनौतियों में शामिल हो चुका है। राजस्थान का राज्य पक्षी आज केवल जैव विविधता की पहचान नहीं, बल्कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन की नई बहस का केंद्र बन चुका है। 21 मई को मनाए जा रहे गोडावण दिवस के बीच सामने आ रहे आंकड़े एक तरफ खतरे की घंटी बजाते हैं तो दूसरी तरफ विज्ञान और सामुदायिक भागीदारी उम्मीद की नई तस्वीर भी दिखाते हैं।
21 मई 1982 को गोडावण को राजस्थान का राजकीय पक्षी घोषित किया गया था। उस समय यह कदम राज्य की प्राकृतिक विरासत को सुरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना गया था। हालांकि आने वाले वर्षों में तेजी से बदलते भू-उपयोग, आधारभूत ढांचों के विस्तार, घासस्थलों के सिकुडऩे और बढ़ती मानवीय गतिविधियों ने इसकी आबादी को तेजी से प्रभावित किया। एक समय देश के कई राज्यों में दिखाई देने वाला यह पक्षी अब सीमित क्षेत्रों तक सिमट चुका है। थार मरुस्थल इसका सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक आश्रय क्षेत्र बनकर उभरा है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2011 तक इसकी वैश्विक आबादी 300 से भी नीचे पहुंच गई। इसके बाद इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर ने इसे क्रिटिकली एंडेंजर्ड श्रेणी में शामिल किया।
राजस्थान में 5 जून 2013 को गोडावण संरक्षण परियोजना शुरू की गई। इसके बाद आवास संरक्षण और प्रजाति बचाने की दिशा में व्यापक स्तर पर काम शुरू हुआ। वर्ष 2019 में राजस्थान फॉरेस्ट डिपार्टमेंट, मिनिस्ट्री ऑफ एनवायरनमेंट, फॉरेस्ट एंड क्लाइमेट चेंज और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के संयुक्त प्रयासों से वैज्ञानिक संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम शुरू हुआ, जिसे गोडावण के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
-वर्ष 2011 तक वैश्विक आबादी 300 से कम हुई
-हालिया सर्वेक्षण में प्राकृतिक क्षेत्र में केवल 41 गोडावण दर्ज
-संरक्षण केंद्रों में संख्या बढकऱ 86 तक पहुंची
-वर्ष 2013 में संरक्षण परियोजना शुरू
-वर्ष 2019 में वैज्ञानिक प्रजनन कार्यक्रम शुरू
वर्ष 2026 ने संरक्षण अभियान को नई ऊर्जा दी है। जैसलमेर के रामदेवरा और सुदासरी संरक्षण केंद्रों में कृत्रिम गर्भाधान तकनीक से नए चूजों का सफल जन्म हुआ है। वहीं गुजरात में लगभग एक दशक बाद जम्प स्टार्ट तकनीक से गोडावण चूजे के सफल जन्म ने वैज्ञानिकों के उत्साह को बढ़ाया है। हालांकि चुनौतियां अभी भी कम नहीं हुई हैं। मरुस्थलीय क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रहे अक्षय ऊर्जा ढांचे और उच्च विद्युत प्रसारण लाइनें गंभीर खतरा बनी हुई हैं। संरक्षण विशेषज्ञों के अनुसार विद्युत तारों से टकराव गोडावण मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल है।
-उच्च विद्युत लाइनें सबसे बड़ा खतरा बनी हुई हैं
-घासस्थलों का विखंडन लगातार बढ़ रहा
-प्राकृतिक आवास क्षेत्रों में दबाव बढ़ा
-ऊर्जा ढांचों का विस्तार जोखिम बढ़ा रहा
वन्य जीव विशेषज्ञ डॉ. ममता रावत कहती हैं- गोडावण केवल मरुस्थल का पक्षी नहीं, बल्कि घासस्थलों के स्वास्थ्य और भविष्य का संकेतक है। वन्य जीवन विशेषज्ञ डॉ. सुमित डूकिया स्थानीय समुदायों के साथ आवास पुनस्र्थापन और संरक्षण मॉडल पर काम कर रहे हैं। हाल ही में डॉ. ममता रावत और डॉ. सुमित डूकिया को ओरिएंटल बर्ड क्लब, यूनाइटेड किंगडम ने सामुदायिक संरक्षण आधारित कार्य के लिए सम्मानित किया। विशेषज्ञों के अनुसार
थार की रेत पर गोडावण की धीमी वापसी एक संदेश भी दे रही है कि यदि विज्ञान, समुदाय और संरक्षण एक दिशा में आगे बढ़ें तो विलुप्ति के कगार से वापसी की कहानी भी लिखी जा सकती है।
Published on:
20 May 2026 08:04 pm
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