6 अप्रैल 2026,

सोमवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

तपते रेगिस्तान में स्वास्थ्य की जंग, दूरस्थ गांवों में अब भी बेहतर सुविधाओं की दरकार

प्रतिवर्ष 7 अप्रेल को मनाए जाने वाले विश्व स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर जहां देशभर में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का संकल्प दोहराया जाता है, वहीं सीमावर्ती जैसलमेर जिले की चिकित्सा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत अभावों की अलग ही तस्वीर बयां करती है।

3 min read
Google source verification

प्रतिवर्ष 7 अप्रेल को मनाए जाने वाले विश्व स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर जहां देशभर में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का संकल्प दोहराया जाता है, वहीं सीमावर्ती जैसलमेर जिले की चिकित्सा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत अभावों की अलग ही तस्वीर बयां करती है। जिले में डॉक्टरों के साथ नर्सिंग स्टाफ की भारी कमी का रोग निरंतर जारी है। पिछले कुछ समय के दौरान राज्य सरकार की ओर से बार-बार चिकित्सकों की तैनाती किए जाने से एकबारगी आंशिक सुधार अवश्य आता है, लेकिन उच्च अध्ययन के नाम पर चिकित्सक यहां से वापसी का टिकट कटाने में कामयाब हो जाते हैं। वहीं रसूखदार स्थानांतरण करवाने में सफल हो जाते हैं।

दूसरी तरफ विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी से थोड़ी भी गम्भीर बीमारी की अवस्था में बाहरी शहरों की ओर रुख किए जाने की दशकों पुरानी समस्या आज भी निरंतर जारी है। पत्रिका पड़ताल में यह बात सामने आई है कि स्वास्थ्य विभाग की ओर से जिले के सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर कम से कम एक डॉक्टर की उपलब्धता सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया लेकिन हकीकत जुदा है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक उपचार के आगे की चिकित्सा व्यवस्था ठप है। ग्रामीण क्षेत्रों में बमुश्किल सामान्य चिकित्सक लगाए जा सके हैं, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर विशेषज्ञ डॉक्टरों के कई पद अब भी खाली पड़े हैं। स्त्री रोग, शल्य चिकित्सा, बाल रोग और मेडिसिन जैसे महत्वपूर्ण विभागों में विशेषज्ञों की कमी के कारण गंभीर मरीजों को जोधपुर या अन्य बड़े शहरों में रेफर करना पड़ रहा है, जिससे समय और खर्च दोनों बढ़ जाते हैं।

हकीकत: ग्रामीण व्यवस्था का सच

- सीमावर्ती जैसलमेर जिले में जैसलमेर व पोकरण में 2 जिला अस्पताल, 13 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और 32 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र संचालित हो रहे हैं।

- मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी के अधीन प्रमुखतया आने वाले ग्रामीण चिकित्सा केंद्रों के लिए चिकित्सकों के कुल 135 पद स्वीकृत हैं, जिन पर 75 वर्तमान में कार्यरत हैं और 60 स्थान रिक्त चल रहे हैं।

- जिले में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की मोनीटरिंग के लिए अधिकारियों के 11 पदों के विरुद्ध केवल 4 ही कार्यरत हैं, 7 पद रिक्त हैं और लगे हुए अधिकारियों को एकाधिक जिम्मेदारियां सम्भालनी पड़ रही हैं।

- नर्सिंग स्टाफ की स्थिति भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। हाल में नर्सों की नियुक्ति के बावजूद जिले में 44 पद खाली हैं। इनमें भी वरिष्ठ नर्सिंग अधिकारी के 34 में से 23 पद रिक्त हैं।

- जिले में एएनएम के 385 पदों में से 343 कार्यरत हैं और 42 खाली हैं। उनके अलावा लैब टेक्नीशियन से लेकर अन्य कई कार्मिकों का टोटा बना हुआ है।

यहां भी यही कहानी, जिला अस्पताल में आधे से भी कम डॉक्टर

जैसलमेर मुख्यालय पर आजादी से पहले से संचालित जवाहिर चिकित्सालय में सामान्य से विशेषज्ञ चिकित्सकों की भारी कमी लगातार बनी हुई है। यहां चिकित्सकों के कुल 48 पद स्वीकृत हैं, इनमें से 21 पद रिक्त हैं जबकि 21 पर चिकित्सक कार्यरत हैं और 6 चिकित्सक आगे पढ़ाई के लिए गए हुए हैं। मतलब, 48 में से केवल 21 ही काम कर रहे हैं। अस्पताल में रेडियोलॉजिस्ट, पैथोलॉजिस्ट के पद लम्बे समय से रिक्त हैं। आई, एनेस्थेसिया और इएनटी के 1-1 विशेषज्ञ हैं। जिनके छुट्टी पर जाने से पूरा विभाग बंद हो जाता है। जवाहिर चिकित्सालय के पीएमओ डॉ. रविन्द्र सांखला ने बताया कि सरकार और विभाग से लगातार पत्राचार कर रिक्त पदों पर नियुक्तियां करने का अनुरोध किया जाता है।

एक भी पद खाली न रहे, इसके लिए प्रयास

जिले में चिकित्सकों के रिक्त पदों की समस्या का समाधान करने के लिए पुरजोर ढंग से प्रयास किए जा रहे हैं। वर्तमान में आसपास के चिकित्सकों की ड्यूटी लगाई जाती है। आने वाले दिनों में सरकार से मार्गदर्शन लेकर यूटीबी के आधार पर चिकित्सक लगाने की कोशिश करेंगे, जिससे फील्ड में चिकित्सकों का एक भी पद खाली न रहे।

- डॉ. राजेंद्र कुमार पालीवाल, सीएमएचओ, जैसलमेर