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शक्तिहीन हुई जल की शक्ति, आसमां में ओझल हो रहा ‘अमृत’

-रण क्षेत्रों में बरसाती पानी को रोककर पेयजल या कृषि में उपयोग करने की योजना को झटका-सर्वाधिक कम बारिश वाले जिलों की फेहरिस्त में शामिल है जैसलमेर

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शक्तिहीन हुई जल की शक्ति, आसमां में ओझल हो रहा 'अमृत'

शक्तिहीन हुई जल की शक्ति, आसमां में ओझल हो रहा 'अमृत'

जैसलमेर. मरुप्रदेश में पानी का महत्व किसी से छिपा नहीं है, हमेशा से अकाल का दंश झेलने को मजबूर जैसलमेर जिले के बाशिंदों को बारिश से कितनी खुशी मिलती है, इसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। बावजूद इसके हकीकत यह है कि बारिश के मौसम में जमा होने वाला करोड़ों गैलन हर वर्ष उपयोग के अभाव में भाप बनकर उड़ जाता है। दूसरी ओर पानी की समस्या यहां बनी रहती है। निराशाजनक बात यह है कि जिले के अलग-अलग रण क्षेत्रों में जमा होने वाले बरसाती जल के उपयोग के लिए वर्ष २००६-०७ में तत्कालीन जिला प्रशासन ने योजना की संकल्पना की थी। इसके तहत रण क्षेत्रों में बारिश के पानी को रोककर उसका खेती या पीने के लिए उपयोग किया जाना था। इसका खाका भी तैयार हुआ था, लेकिन उसके बाद क्रियान्वयन न होने से आज तक रेगिस्तानी क्षेत्र में अमृत के समान माने जाने वाला पानी व्यर्थ ही भाप बनकर उड़ रहा है। हकीकत यह भी है कि प्रशासनिक स्तर पर चलाए जा रहे जलशक्ति अभियान के भी परिणाम उम्मीदों की तुलना में अब तक नजर नहीं आए हैं। ऐसे में इस बार भी आशंका गहरा रही है कि यदि बारिश अच्छी हुई तो आकाश से बरसने वाला अमृत तुल्य पानी एक बार फिर वाष्प बनकर उड़ रहा है।
जानकारों के मुताबिक यदि बेहतर प्रयास हो तो खारे पानी में मिलने से पहले ही मीठे पानी के रण को छोटे खड़ीनों में बांटकर लंबे समय तक कृषि कार्यों में वहां जमा पानी का उपयोग किया जा सकता है। इसी तरह से बारिश के बाद लबालब भरे रण के पानी के प्रवाह को एनीकट से रोककर कृषि योग्य भूमि में खेती के लिए काम में लिया जा सकता है।
यूं किया जाना था बरसाती पानी का संरक्षण
-सरहदी जिले में वर्ष 2006 में अतिवृष्टि के कारण जिले के खड़ीनों में काफी मात्रा में पानी जमा हुआ, लेकिन उपयोग के अभाव में अधिकांश व्यर्थ हो गया।
-बरसाती पानी के संरक्षण को लेकर योजना तत्कालीन जिला कलक्टर और वर्तमान में जिले के प्रभारी सचिव डॉ. केके पाठक ने तैयार करवाई थी।
-रूपसी व खाभा जैसे मीठे पानी की प्रकृति वाले रणों में बरसाती पानी को रोककर खारे पानी में मिलने से इसको रोकना था।
-इस पानी को रोकने के बाद खड़ीनों को लघु स्तर पर विभक्त कर पम्पिंग से किसानों को कृषि कार्यों में दिया जाना था।
-सबसे कम बारिश वाले जिलों की फेहरिस्त में शामिल जैसलमेर के लिए यह योजना आज भी जरूरत बनी हुई है।
...और इस तरह बन गए रण क्षेत्र
सरहदी जैसलमेर जिले में करीब 40 से 50 किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले रण के बारे में माना जाता है कि वे कभी नदी के क्षेत्र थे। ऐसे में नदी में पानी नहीं आने से यहां अवशेष पानी सूर्य की गर्मी के कारण भाप बनकर उड़ गया। पानी के उडऩे के कारण पानी में स्थित तत्व खनिज लवण के रुप में जमते रहे। यही कारण है कि ये रण स्वाद में खारे हैं। खारे रण में भूमि के रिसाव कम होने से पानी का ठहराव अधिक होता है। वाष्पीकरण के कारण खारापन अधिक रहता है।

इन रणों में मिलता है मीठा पानी
-काणोद व हड्डा के रण खारे हैं, वहीं खाभा व रुपसी के रण मीठे हैं। इसी कारण यहां पानी में खड़ीन के माध्यम से खेती की जाती है। जहां मिट्टी का खारापन कम है वे रण मीठे होते हैं।इसके अलावा पानी का जमीन की सतह के नीचे अवशोषण भी होता है।

एक्सपर्ट व्यू : 725 साल पहले पालीवाल ब्राह्मणों ने अपनाई थी खड़ीन तकनीक
इतिहासवेत्ता ऋषिदत्त पालीवाल बताते हैं कि जैसलमेर- बाड़मेर सुदूर मरुस्थलीय क्षेत्र में बसे हुए हैं, जहां पूरा जनजीवन ही बरसाती पानी पर निर्भर रहता है। यहां निवास करने वाले लोगों को सिंचाई तो दूर पीने के पानी के लिए कोसों दूर जाना पड़ता है। आज जैसलमेर के एक क्षेत्र में नहरी पानी पहुंचने से सिंचाई व पीने के पानी की समस्या कुछ सीमा तक दूर हुई है, लेकिन मरुस्थलीय क्षेत्र में बहुत बड़ा भूभाग आज भी बरसाती पानी पर निर्भर है। जरूरत है बरसाती पानी के उपयुक्त संरक्षण की ताकि बरसात के मौसम में आने वाले पानी को लंबे समय तक संजोकर रखा जा सके और उस बरसाती पानी से किसान को किसानी के लिए और आमजन को पीने के पानी की आपूर्ति की जा सके। इसके लिए आवश्यकता है बरसात के पानी को सही जगह पर एक बांध के रूप में संरक्षित करने की जिसके लिए सरकार को कदम आगे बढ़ाने चाहिए। जैसलमेर जैसे बड़े भूभाग में आज से 725 साल पहले पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा बरसाती जल को संरक्षित करने की जो तकनीक खड़ीन के रूप में अपनाई गई उसको प्रचारित प्रसारित करने की आवश्यकता है, ताकि इस मरुस्थल क्षेत्र के किसान बरसात के मौसम में बरसाती जल को संरक्षित कर सर्दी ऋतु की फसलें ले सके और लंबे समय तक पीने के पानी को संजोया जा सके। खड़ीन एक ऐसी पद्धति है, जहां ढलान के क्षेत्र में पानी बहने की विपरीत दिशा में मेड़बंदी करके उसको रोका जाए वर्तमान स्वरूप में उसको एक छोटा बांध बांधने की परिभाषा दी जा सकती है।

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