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Jaisalmer News: खतरा-ए-जान बने घरों पर लगे टिन के छप्पर, हादसों को दे रहे दावत; बावजूद इसके बना फैशन

जैसलमेर के सोनार दुर्ग सहित शहर भर में छतों पर गर्मी व बारिश आदि से बचाव के लिए टिन के छप्पर लगवाने की मानो होड़-सी मच गई है।पूर्व में जैसलमेर में इक्का-दुक्का घरों पर ही ऐसे छप्पर नजर आते थे, लेकिन वर्तमान में तस्वीर पूरी तरह से बदल चुकी है। अब तो यह फैशन का रूप धारण कर चुका है।

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tin roof on houses become life threatening in Jaisalmer Rajasthan

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जैसलमेर। गत दिनों जैसलमेर में आए तूफान की वजह से सोनार दुर्ग के भीतरी मोहल्ले में एक मकान में छत की जगह लगा छप्पर पंखे सहित उड़ कर कम से कम 50 फीट की दूरी पर बिजली के खंभे पर आकर गिरा। गनीमत यही रही कि उस समय वहां आसपास कोई नहीं था, वरना यह जान का जोखिम हो सकता था। ऐसे ही एक छप्पर उड़ कर एक स्कूटर पर गिरा और वह क्षतिग्रस्त हो गया।

फैशन बना टिन के छप्पर लगवाना

दरअसल, जैसलमेर के सोनार दुर्ग सहित शहर भर में छतों पर गर्मी व बारिश आदि से बचाव के लिए टिन के छप्पर लगवाने की मानो होड़-सी मच गई है। दो-तीन मंजिला मकानों के ऊपर लगे ये छप्पर तेज अंधड़ या तूफान के दौरान उड़ कर किसी भी व्यक्ति के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है। पूर्व में जैसलमेर में इक्का-दुक्का घरों पर ही ऐसे छप्पर नजर आते थे, लेकिन वर्तमान में तस्वीर पूरी तरह से बदल चुकी है। अब तो यह फैशन का रूप धारण कर चुका है।

लोगों का कहना है कि छत पर छप्पर लगाने से सूरज की रोशनी सीधे घर पर नहीं आती या बारिश के समय भी उसके नीचे बैठा जा सकता है। हकीकत यह है कि प्राकृतिक बदलाव की वजह से वर्ष भर में कई बार आने वाले तेज अंधड़ या तूफान के कारण लोहे की चादर या सीमेंट से बने ये छप्पर उड़ कर दुर्भाग्यवश किसी की भी जान-माल का नुकसान कर सकते हैं।

जिम्मेदार कर रहे अनदेखी

गौरतलब है कि घरों के ऊपरी हिस्से में लोहे के एंगल लगा कर उन पर नट से छप्पर को कसा जाता है। न कोई रोकने वाला, न टोकने वाला तेज हवाओं के प्रभाव से ये नट खुल सकते हैं या छप्पर पुराना होने पर उसका छेद बड़ा होकर वह बाहर निकल जाता है। ऐसा पूर्व में भी कई बार हो चुका है। न तो लोग पूर्व में हुए हादसों से सबक सीख रहे हैं और न ही सरकारी तंत्र की तरफ से छतों पर छप्पर लगाने की मनोवृत्ति पर अंकुश लगाने की कोई कोशिश की जा रही है।

हकीकत यह भी

●शहर हो रहा बदरंग - जैसलमेर शहर एक जीवित संग्रहालय कहा जाता है। यहां की सैकड़ों वर्ष प्राचीन बसावट पर देशी-विदेशी सैलानियों के साथ दुनिया भर के गुणीजन मोहित हुए बिना नहीं रहते।

●मौजूदा समय में ऊंचाई से शहर का विहंगावलोकन किया जाए तो पीत पाषाणों से निर्मित घरों पर कई जगह छप्पर लगे नजर आते हैं।

●यहां भी अधिकांश घरों पर लगे छप्पर आसमानी रंग के हैं, जबकि जैसलमेर में पीले पत्थरों से निर्मित घरों का अपना सौन्दर्य है।

●आसमानी रंग के छप्परों की वजह से गोल्डनसिटी के नाम से मशहूर जैसलमेर को कोई भी ब्लूसिटी बोल सकता है। -घरों के साथ-साथ व्यावसायिक प्रतिष्ठानों आदि पर भी छप्पर लगाने का के्रज बढ़ा है। तीन से चार मंजिला ऊंचाई वाली इमारतों पर भी छप्पर लगाए जा रहे हैं।

●ज्यादा ऊंचाई पर छप्पर होने से उनके अंधड़ या तूफान आने की सूरत में उखड़ने की आशंका ज्यादा होती है। ये छप्पर फिर ज्यादा दूरी तक जाकर नुकसान पहुंचाने में सक्षम होते हैं।

●ज्यादा गर्मी से बचाव के लिए अन्य उपाय अपनाए जा सकते हैं, लेकिन मशीनी युग में उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। पारम्परिक अंदाज में अब जैसलमेर में लकड़ी की छत कहीं नजर नहीं आती। उनका स्थान पत्थर की पट्टियों या सीमेंट व कंकरीट से मिलकर बनने वाली आरसीसी ने ले लिया है।

क्या कहते हैं स्थानीय: जैसलमेर में आंधी के मौसम में उन घरों पर खतरा मंडराता है, जो कि इन छप्परों के आसपास रहते हैं। दुर्भाग्यवश हादसा होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। गनीमत है कि अबतक कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। -नरेन्द्रसिंह, स्थानीय निवासी

घरों या व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर छप्पर लगाने का सिलसिला विगत वर्षों में बढ़ा है। आंधी के दौरान हादसे की आशंका बढ़ जाती है। हाल ही में आंधियों के दौर के समय खतरा बढ़ गया है। भविष्य में हादसों को रोकने के प्रभावी प्रयासों की जरूरत है। -प्रेम कुमार, स्थानीय निवासी