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गांव चले शहर बनने- बदलाव किस हद तक? : जेडी चारण

मैंने कुछ पंक्तियां पढ़ी थी जो कुछ इस प्रकार है... पर देखा है मैंने थोड़ा सा शहर घुस रहा है गांव में, कर रहा है कोई चुपके से छेद नाव में..। भावार्थ यह है कि गांव में भी अब शहर कि तर्ज पर बदलाव हो रहा है।

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गांव चले शहर बनने- बदलाव किस हद तक? : जेडी चारण

गांव चले शहर बनने- बदलाव किस हद तक? : जेडी चारण

जैसलमेर. मैंने कुछ पंक्तियां पढ़ी थी जो कुछ इस प्रकार है... पर देखा है मैंने थोड़ा सा शहर घुस रहा है गांव में, कर रहा है कोई चुपके से छेद नाव में..। भावार्थ यह है कि गांव में भी अब शहर कि तर्ज पर बदलाव हो रहा है। या यूं कहे कि शहर कि गांव में घुसपैठ हो रही है तो जयादा उचित होगा। ये कहां तक उचित है चलिए इस पर कुछ चर्चा करते है और कुछ ऐसे तथ्यों को उद्घाटित करते हैं जो आपने अपने आस पास जरूर देखेए सुने और महसूस किए होंगे। अक्सर माना जाता है कि गांव में शहर का घुसना यानी कि गांव का विकास होना, तरक्की होना है । तो फिर गांव का शहर की तर्ज पर बदलने में हर्ज क्या हैं? क्या गांवों का विकास नही होना चाहिए.. आम धारणा ये है कि भारत की आत्मा गांव में बसती है, गांवों में सुकून है, भाईचारा है, मानवीयता आदि अभी भी जिंदा है। लोग एक दूसरे की सहायता करते है, बड़े-बुजुर्ग एवं स्त्रियों का सम्मान करते है इत्यादि इत्यादि। इसके विपरीत शहरों के बारे में ये बताया जाता है कि बहुत भागदौड़ भरी जिंदगी है, मन को शांति नही मिलती, तनाव भरी जिंदगी है, मानवता, आपसी भाईचारा, अपनापन जैसा कुछ नहीं है, लोग बहुत ज्यादा व्यावसायिक या खुदगर्ज होते हैं और इंसान एक मशीन बन जाता है। ये सारी बातें आज भी काफी हद तक कई मायनों में सही भी है, लेकिन सुनी सुनाई बातों का सच क्या हैं ? जब तक आपने खुद देखा, सुना या महसूस न किया हो, तब तक सचाई से आप कोसों दूर रहते हैं और ये सब गॉसिप ही रह जाती हैं।
सच केवल वही जानता है जो शहर एवं गांव दोनों से बेहद करीबी से जुड़ा हो या जिसको दोनों तरह के माहौल में जिंदगी जीने का मौका मिला हो, वो ही काफी हद तक सचाई बयां कर सकता हैं कि गांव चले शहर बनने की हकीकत क्या हैं और ये किस हद तक उचित या अनुचित है। पिछले करीब 10 साल से भी ज्यादा समय से मुझे गांव एवं शहर ;मुम्बईद्ध दोनो की जिंदगी जीने एवं दोनों माहौल को बहुत करीबी से देखने का मौका मिला और मैं एक बात तो दावे के साथ कह सकता हूं कि आज गांवों की हालत कुछ इस प्रकार कि है जो कभी पश्चिमी करण की वजह से भारत की मानी जाती थी या आज भी मानी जा रही है कि हमने पश्चिमीकरण को अपने सांस्कृतिक आदर्शो की कीमत पर अपनाया यानी कि हमने पश्चिम की उदारवादी एवम विकासवादी संस्कृति को तो अपनाया। कल्पना करिये कि आने वाले अगले 30 साल बाद क्या हालत होगी ये नव पीढ़ी अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या हन्तान्तरित करेगी। पश्चिमीकरण को अपनाना बुरा नहीं था परन्तु उसको किस हद तक अपनाना और किसकी कीमत पर अपनाना ये देखना जरुरी था। हम पश्चिमीकरण को अपनाते गए और पुरातन को भूलते गए। यदि एक पौधे की जड़े जमीन से काटकर, उसको लटकाकर, उसके ऊपर पानी डालते रहोगे तो क्या वह पौधा बढ़ेगा ?