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10 किमी दूर से ही नजर आएगी ये मूर्ति, 100 फीट ऊंची पहाड़ी पर सेना के हेलीकॉप्टर से होगी एयरलिफ्ट

दिल्ली सल्तनत तक को अपनी वीरता का लोहा मनवाने वाले जालोर के शासक कान्हड़देव के पुत्र वीर वीरमदेव की अष्टधातु की प्रतिमा आगामी दिनों में टुंकाली पहाड़ी पर स्थापित होगी। करीब 100 फीट ऊंचाई पर 10 फीट ऊंचाई और 6 फीट चौड़ाई वाले मजबूत फाउंडेशन पर 18 फीट की इस प्रतिमा को स्थापित किया जाएगा।

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खुशालसिंह भाटी
दिल्ली सल्तनत तक को अपनी वीरता का लोहा मनवाने वाले जालोर के शासक कान्हड़देव के पुत्र वीर वीरमदेव की अष्टधातु की प्रतिमा आगामी दिनों में टुंकाली पहाड़ी पर स्थापित होगी। करीब 100 फीट ऊंचाई पर 10 फीट ऊंचाई और 6 फीट चौड़ाई वाले मजबूत फाउंडेशन पर 18 फीट की इस प्रतिमा को स्थापित किया जाएगा। हरिद्वार से ट्रैलर से यह मूर्ति जालोर तक कोरोना काल में पहुंची थी, लेकिन उसके बाद कई अड़चनों के बाद अब सहमति से इस विशालमूर्ति को स्थापित करने का निर्णय हुआ है। 3 हिस्सों में पहुंची इस विशाल मूर्ति का एक हिस्सा विशाल अश्व का है। इसका वजन 2000 किलो है। दूसरा हिस्सा वीरमदेव के धड़ का है और तीसरा हिस्सा अश्व के मुंह का है। ये दोनों हिस्से 1000 किलो के लगभग है। इन तीनों ही हिस्सों को स्थापित करने से पहले जोड़ा जाएगा। उसके बाद पहाड़ी पर स्थापित किया जाएगा। वजन अधिक होने के साथ चढ़ाई अधिक होने से मूर्ति को हेलीकॉप्टर से एयरलिफ्ट किया जाएगा। इसके लिए सेना के अधिकारियों ने विजिट की है और परमिशन भी मिल चुकी है।

कान्हड़देव प्रबंध बना मुख्य आधार
वीरमदेव फाउंडेशन ट्रस्ट अध्यक्ष देवेंद्रसिंह मोछाल बताते हैं इस मूर्ति का निर्माण हरिद्वार में मशहूर मूर्तिकार 85 वर्षीय फकीरचरण फिरोडा ने किया है। पद्मनाथ कृत कान्हड़देव प्रबंध के उल्लेख के आधार पर वीरमदेव की कदकाठी, पहनावा, अंगरखा और 27 वर्ष की युवा अवस्था को मूर्ति में साकार किया गया। वहीं मालाणी नस्ल के घोड़े को आकार देने में मूर्तिकार का स्थानीय अश्व विशेषज्ञ रावल खेतदान मिंडवास, गजेंद्रपालसिंह पोषाणा ने सहयोग दिया। उसी के आधार पर घोड़े का ग्रह घाट तैयार हुआ और इसी आधार पर घोड़े की गर्दन कनौती (कानों का शेफ), पैरों को आकार दिया गया। शंभूसिंह सेरणा बताते हैं कि इसी मूर्तिकार ने पुराने संसद भवन में महाराणा प्रताप की मूर्ति का निर्माण किया। इसके अलावा हरिद्वार में कई मूर्तियां भी इन्हीं द्वारा बनाई गई। दिल्ली में आदिवासी संग्रहालय का निर्माण भी फिरोडा ने ही किया।
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ये है विशेषता बनाती है मूर्ति को खास
- 18 फीट ऊंची यह मूर्ति अष्टधातु से निर्मित है।
- नकुल कृत शालीहोत्र ग्रंथ के आधार मालाणी नस्ल के विशेष विशालकाय घोड़े का निर्माण।
- वीरमदेव के एक हाथ में 5 फीट बड़ी 20 किलो वजनी अष्टधातु की तलवार
- राजपूती परिधानों में कवच, कुंडल, जूतियां पहने वीरमदेव का रौबिला रूप