
Kalmi plum yields in Bagoda area
मेघाराम पारंगी. बागोड़ा. क्षेत्र के किसान अब बदलते परिवेश के साथ आधुनिक संसाधनों से खेती कर अपनी कमाई में भी इजाफा कर रहे हैं। पुराने तरीकों को छोड़ युवा व शिक्षित किसान मिट्टी की गुणवत्ता को परखने के बाद वैज्ञानिकों की मदद से खेती के दम पर आर्थिक सम्पन्नता की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। इसी कड़ी में नवापुरा ध्वेचा के एक किसान ने अपनी मेहनत व सूझबूझ से एक ऐसे बेर की पैदावार तैयार की है जो कि स्वाद व सेहत दोनों के लिए बेहतर साबित हो रहा है। करीब पांच साल पूर्व चर्चा में आए ताइवानी बेर पर स्थानीय कलमी बेर भारी पड़ रहे हैं। इस क्वालिटी के एक बेर का वजन ही 100 ग्राम के करीब है। जो हर किसी के लिए चर्चा का विषय है। इससे पूर्व ताइवानी बेर भी वजन व आकर के लिए चर्चा में आए थे। उपखंड मुख्यालय से 20 किमी दूर नवापुरा ध्वेचा गांव में केवाराम चौधरी की ढाणी मार्ग पर रेतीले धोरों के बीच स्थित एक खेत में इन दिनों कलमी बेरों से झाडिय़ां लदी हुई है। इस बेर की खूबी है कि यह आकार में सेव जैसा ही है। साथ ही खाने में भी स्वादिष्ट है। नवापुरा ध्वेचा निवासी मोतीराम कलबी इस कलमी बेर की पैदावार से अच्छी आमदनी भी कर रहे हैं।
गुजराती व देशी का कोंबिनेशन
देशी बेर के पेड़ के जमीनी हिस्से में बारिश के मौसम में गरजा डाली कपोलबद्ध निकलता है। गुजरात व काजरी से लाई गई डाली को कट लगाकर इसमें जोडऩे के बाद इसे टेप किया जाता है। करीब तीन माह बाद उसी डाली के अलावा उस देशी बेर के पेड़ को काट दिया जाता है जो पूर्व में था। अंदाजन एक वर्ष में उसके सेव के आकार जैसे बेर आ जाते हैं और एक पेड़ पर करीब ढाई से तीन सौ किलो आवक होने से आठ से नौ हजार रुपए की आमदनी प्रत्येक पेड़ से होती है। उससे बिजली, खाद व मेहनत की भरपाई हो जाती है।
बेरों से लदा पेड़, लकड़ी का सहारा
खेत में बेर के पेड़ों पर बेर की आवक इस कदर है कि इन वृक्षों को लकड़ी के सहारे रखना पड़ता है। करीबन ढाई-तीन क्विंटल बेरों के वजन को यह सह नहीं पाते हैं और लकड़ी का सहारा नहीं दिया जाए तो इनके टूटने का अंदेशा बना रहता है।
अब हो रही अच्छी पैदावार
दिसंबर-फरवरी के बीच बेर पककर तैयार होते हैं। बेर को नुकसान से बचाने के लिए एक व्यक्ति दिनभर पक्षियों को उड़ाने में लगा रहता है। बेरों को बेचने बागोड़ा व भीनमाल जाना पड़ता है, लेकिन वहां भी सब्जी वाले थोक भाव में नहीं खरीदने से मुनाफा नहीं मिल रहा है। ये बेर कोई एक बार खा ले तो स्वाद में विदेशी सेव से कम नहीं है। खेत में तीन सौ बेर के पौधे लगा रखे हैं। जिससे तीन साल से खासी आमदनी मिल रही है।
- मोतीराम कलबी, ग्रामीण, नवापुरा ध्वेचा
बागोड़ा-धुम्बडिय़ा सड़क मार्ग पर जवाई नदी किनारे धुम्बडिय़ा निवासी समरथाराम व हंजाराम माली के वागतरा नाम के खेत में कलमी बेर की अच्छी उपज हो रही है। उसके बावजूद किसानों का इस खेती की ओर रुझान नहीं बढ़ रहा है। किसानों को इसकी खेती से कमल लागत में अच्छा खासा मुनाफा मिल सकता है।
- आकाश कुमार, ग्रामीण, बागोड़ा
Published on:
03 Feb 2020 10:30 am
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