28 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

चितौडग़ढ़ में जौहर के 8 साल बाद ही खिलजी की बुरी नजर पड़ी थी जालोर पर

- 1303 ई. में चितौडग़ढ़ में अल्लाउद्दीन के हमले के बाद रानी पद्मावती और 16 हजार क्षत्राणियों ने किया जौहर, 8 साल बाद ही 1311 में इसी आक्रांता के कारण

3 min read
Google source verification
jalorenews

Khalidji had a bad look at Jalore after 8 years of Johar in Chittodgarh.

जालोर. जालोर का इतिहास शौर्य, वीरता, बलिदान और जौहर का साक्षी रहा है। ऐतिहासिक स्वर्ण गिरी दुर्ग के शासक वीर कान्हड़देव और उनके पुत्र वीरमदेव ने मुगल आक्रांता अल्लाउद्दीन खिलजी से लौहा लिया और उनके दांत खट्टे कर दिए। जालोर दुर्ग पर आक्रमण चितौडग़ढ़ के शासक रतनसिंह की रानी पद्मावती पर इस मुगल आक्रांता की बदनीयती के बाद 1303 ई. में किए गए आक्रमण के मात्र दो साल बाद 1305 ई. में किया गया। इस दौरान उसे हार का मुंह देखना पड़ा। जिसकी टीस उसे थी। 1303 में चितौडग़ढ़ शासक की पराजय के बाद रानी पद्मावती समेत 16 हजार रानियों ने जौहर किया। इधर, 1305 में जालोर में कान्हड़देव और कांधन के सेना की ओर से मिली हार के बाद अल्लाउद्दीन ने 6 साल तक जालोर पर आक्रमण किए और घेराबंदी के बाद कान्हड़देव और वीरमदेव की वीरगति के बाद दुर्ग पर कब्जा किया। इस दौरान जालोर दुर्ग में 1584 क्षत्राणियों ने अपने सतीत्व की रक्षा को जौहर को गले लगाया। वर्तमान में जालोर में इस आक्रांता द्वार किया गया यह आक्रमण इसलिए अहम हैं, क्योंकि राजस्थान ही नहीं पूरे देश में पद्मावती फिल्म के रिलिज होने से पहले ही विरोध के स्वर मुखर हो रहे हैं। राजस्थान में मुख्य रूप से राजपूत समाज की ओर से इस बात को लेकर विरोध किया जा रहा है कि फिल्म के माध्यम से राजस्थान और भारतीय इतिहास के साथ छेड़छाड़ की जा रही है।
पांच बड़े आक्रमण
जहां फिल्मी जगत में अल्लाउद्दीन खिलजी को महिमामंडित करने का प्रयास किया जा रहा है। वहीं राजस्थान और भारतीय इतिहास में यह एक बर्बर शासक और व्यक्तित्व है। इसने 1301 में रणथंबौर की घेराबंदी कर दी। इस दौरान वहां के शासक हमीरदेव चौहान से उसकी शरण में आए दो विद्राही मांगे, लेकिन शासक हमीरदेव ने उन्हें सौंपने से मना करने पर अल्लाउद्दीन से हमला किया। उसके 2 साल बाद ही चितौडग़ढ़ पर फिर से वहां के शासक रतनसिंह की पत्नी रानी पद्मावती (पद्मिनी) पर बदनीयती के चलते हमला किया और इस दौरान राजपूतों से वीरता का परिचय दिया इस दौरान चितौड़ में 16 हजार क्षत्राणियों ने जौहर किया। इसी घटनाक्रम को फिल्म जगत में तोड़ मरोड़ कर पेश करने का प्रयास किया जा रह है। इसके दो साल बाद ही 1305 में जालोर में दुर्ग की घेराबंदी की। इस दौरान 1584 क्षत्राणियों ने जौहर किया। इसी तरह 1310 में सिवाणा में भी अल्लाउद्दीन के आक्रमण के दौरान अपनी आबरु बचाने को जौहर हुआ। एक जौहर जैसमलेर में भी इसी आक्रांता की बदनीयती से हुआ।
सोमनाथ शिवलिंग को कैद से छुड़ाया
मुहणोत नैणसी की ख्यात के अनुसार अल्लाउद्दीन खिलजी ने गुजरात पर चढ़ाई की। वहां की बहुत सी जनता को मारा और सोरठ में देव पट्टन में सोमइया (सोमनाथ) महादेव को लूटकर ज्योतिर्लिंग को गीले चमड़े में बांधा और गाड़ी में डालकर चल पड़ा। गुजरात से वापस लौटते समय खिलजी ने जालोर के गांव सांकरणा में डेरा डाला। यहां जालोर के वीर कान्हड़देव, वीरमदेव और सैनानी कांधल ने खिलजी के शिविर पर हमला किया गया। इस अचानक हुए हमले में खिलजी किसी तरह जान बचाकर भागा। कान्हड़देव ने सोमइया महादेव के ज्योतिर्लिंग को उठाया और ***** की सम्मान के साथ मकराणे गांव में स्थापना की व वहां बड़ा मंदिर बनवाया। इस तरह इस वीर राजपूत ने उस वक्त के भारत के सबसे शक्तिशाली बादशाह को पीठ दिखाकर भागने के लिए मजबूर कर दिया और हिन्दुओं पर किए अत्याचार और महादेव के अपमान का बदला लेकर दुश्मनी मोल ली। जालोर के साहित्यकार हरिशंकर राजपुरोहित की पुस्तक जालोर गढ़ में जौहर में बताते हैं कि अल्लाउद्दीन जब गुजरात के सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण के लिए रवाना हुआ तो गुजरात शासन की गुजारिश पर जालोर से रास्ता देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद अल्लाउद्दीन ने दूसरा रास्ता अपनाया और लौटते वक्त फिर जीत की खुमारी में जालोर का रास्ता चुना, लेकिन कान्हड़देव और कांधन की सेना ने उस पर हमला किया और पराजित किया। लेकिन उसके बाद अल्लाउद्दीन और कान्हड़देव की सेना के बीच 6 साल तक युद्ध चला और अंत में 1311 ई. में जालोर पर अल्लाउद्दीन ने कब्जा कर लिया। अधिवक्ता मधुसूदन व्यास भी बताते है कि 1305 ई. में जालोर में एक युद्ध हुआ था, उसमें अल्लाउद्दीन की सेना को हार का सामना करना पड़ा, जबकि उसके करीब 6 साल बाद ही 1311 ई. में जालोर में कान्हड़देव की सेना और अल्लाउद्दीन की सेना के बीच अंतिम युद्ध हुआ, जिसमें कान्हड़देव वीरगति को प्राप्त हुए इस दौरान 1584 क्षत्राणियों ने जौर किया।
रिपोर्ट: खुशालसिंह भाटी