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गांवों में आज भी जारी है ‘लाह’ परंपरा, आपसी सहयोग से बिना कुछ लिए करते हैं फसल कटाई

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गांवों में आज भी जारी है 'लाह' परंपरा

गांवों में आज भी जारी है 'लाह' परंपरा

जीवाणा. आधुनिकता के दौर में एक तरफ जहां लोग फसलों की कटाई के लिए तरह-तरह की मशीनों का उपयोग करते नजर आते हैं। वहीं दूसरी ओर ग्रामीण अंचलों में दशकों से चली आ रही लाह परंपरा के तहत आज भी लोकगीतों के साथ किसान परिवार मिलजुलकर बिना किसी मजदूरी लिए खेत में खड़ी फसल की कटाई कर रहे हैं। इस परंपरा का मुख्य उद्देश्य बिना किसी पारिश्रमिक के फसलों की कटाई में एक-दूसरे की मदद करना है। कुछ ऐसा ही नजारा क्षेत्र में लुंबा की ढाणी के किसान दूदाराम चौधरी के खेत पर फसल कटाई के दौरान देखने को मिला। जहां आस पास के कई किसान इक_ा होकर भीणत गायन के साथ खेत में उगी पूरी फसल की कटाई कर रहे हैं।
भणतियों को कराया जाता है सामूहिक भोज
लाह का एकमात्र उद्देश्य किसान को अतिरिक्त खर्चे से बचाना और आपसी सहयोग को बढ़ावा देना है। जिस किसान के यहां लाह का आयोजन होता है, उनकी ओर से सहयोग करने वाले सभी किसानों के लिए मारवाड़ी अंदाज में भोज का आयोजन किया जाता है। जिसमें बाजरे की रोटी, भरपूर देसी घी-गुड़ का चूरमा और देसी साग खिलाकर आवभगत की जाती है। इसे ग्रामीणों की भाषा में भाणतियो के लिए लाह की लहर कहा जाता है।
आपदाओं से बचाव
किसान अपनी पूरी जमा-पूजी खेत में फसल उगाने के लिए डाल देते हैं। फसल पकने के दौरान कीसी प्रकार की प्राकृतिक आपदा आंधी-तूफान व बेमौसम बारिश आदि से बचने के लिए इसी लाह परंपर के चलते एक-दूसरे का सहयोग कर पकी हुई फसल कुछ ही समय में काट ली जाती है या कटी हुई फसल एकत्र कर ली जाती है। इससे किसान होने वाले नुकसान से बच जाता है।
बुजुर्गों में भी रहता है जोश
लाह परंपरा के तहत लुंबा की ढाणी के एक खेत में सामूहिक फसल कटाई के दौरान नाचते गाते बुजुर्गों में भी एक अलग सा जोश दिखाई दिया। कई बुजुर्गों में फसल कटाई के दौरान युवाओं सी फुर्ती नजर आई। भिणत के साथ लय और ताल से ताल मिलाकर नाचते-गाते देखते ही देखते कई बीघा में फसल की कटाई कर दी गई। किसानों ने बताया कि लाह परंपरा पूर्वजों से चली आ रही है। इस परम्परा के तहत हंसी-खुशी गाते-नाचते सामूहिक रूप से फसल कटाई कर ली जाती है और इस दौरान थकान भी महसूस नहीं होती।