
क्षेत्र में बड़े पैमाने पर होती है टमाटर की खेती, लेकिन अब नुकसान से धीरे धीरे घटने लगा रुझान
प्रतापसिंह देवल
कागमाला. सुंधामाता पर्वत क्षेत्र में टमाटर की खेती पर नेमाटोड कृमि ने विराम लगा दिया। पहले इस क्षेत्र में टमाटर की बम्पर पैदावार होती थी। क्षेत्र में हर रोज भारी मात्रा में टमाटर का निर्यात होता था। लेकिन कुछ सालों में कृमि के जमीन में पांव पसारने से साल—दर—साल टमाटर की पैदावार कम होती गई। कृमि ने क्षेत्र अधिकांश जमीन में फैलाव कर दिया है। कृमि के फैलाव के कारण क्षेत्र के किसान टमाटर व अन्य सब्जियों की बुवाई नहीं कर पा रहे है। किसानों ने कई बार टमाटर की पैदावार लेने की कोशिश की, लेकिन जमीन में फैला कृमि फसल को चट कर जाता है। ऐसे में किसान ने टमाटर की खेती करना बंद कर दिया है। किसानों को मजबूरन अब दूसरी फसलों की बुवाई करनी पड़ रही है। किसानों का कहना है कि टमाटर व अन्य सब्जियों की पैदावार से अच्छी कमाई होती थी। कृमि ने किसानों की टमाटर की खेती की उम्मीद पर पानी फेर दिया।
क्या हैं नेमाटोड
यह रोग ज्यादातर सब्जियों की फसलों में पाया जाता है, जिसमें धीरे धीरे पौधे की जड़ों में गांठ बन जाती है। वह पौधा सूखने लग जाता है, इस बीमारी की रोकथाम के लिए विभिन्न प्रकार के रसायन व दवाइयों का छिडक़ाव कर किसान धन व समय की बर्बादी करता है, लेकिन इस रोग पर पूर्ण नियंत्रण नहीं हो पाता है।
बार—बार बुवाई से कृमि ने फैलाया जाल
सुंधामाता क्षेत्र के दांतलावास, किबला, राजपुरा, शिवगढ़, वाडाभोजा व कागमाला में टमाटर की बम्पर पैदावार होती थी। किसानों ने पारम्परिक खेती को छोड़ टमाटर की खेती का रुख किया था। टमाटर की खेती से किसानों को अच्छी आमदनी भी हो रही थी, लेकिन कृमि ने किसानों के अरमानों पर पानी फेर दिया। क्षेत्र में कृमि के प्रवेश के बाद बार—बार टमाटर की बुवाई होने पर कृमि ने जमीन में अपना जाल फैला दिया। अब क्षेत्र में कृमि का जाल इतना फैल गया है कि टमाटर का पौधा लगाते ही उसे चट कर जाता है।
कृमि से निजात के लिए दिल्ली तक पहुंचे किसान
क्षेत्र में कृमि के फैलने के बाद इसके निदान के लिए किसानों कृषि विभाग के अधिकारियों कई बार गुहार लगाई, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल पाया। इसके बाद किसानों ने दिल्ली कूच भी किया। लेकिन कोई सटीक उपाय नहीं मिल पाया। ऐसे में किसानों थक हारकर टमाटर की खेती से मुख मोड लिया। अब किसान फिर से पारम्परिक खेती करने को मजबूर है।
इनका कहना
आज से 15-20 वर्ष पूर्व इस एरिया में टमाटर की जो पैदावार होती थी। आज उसकी चौथाई पैदावार भी नहीं हो रही है। नेमाटोड जड़ गलन बीमारी से थक कर किसानों ने टमाटर की खेती करना बंद कर दिया।- सेसाराम कीर, कृषक, चितरोड़ी
नेमाटोड कृमि की रोकथाम को लेकर रिसर्च चल रहा है। वैसे टमाटर की खेती साथ गैंदे के पौधै बीच बीच में लगा दिए जाए तो नेमाटोड कृमि को नष्ट करने में मदद मिल सकती है। - वागाराम पुरोहित, सहायक कृषि अधिकारी, मालवाड़ा
Published on:
12 Mar 2022 08:56 pm
बड़ी खबरें
View Allजालोर
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
