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महंगाई के कारण पैरों में काटने लगी रजवाड़ी जूती

- विश्व प्रसिद्ध भीनमाल की जूती पर संकट के बादल, हाथों से बनी जुटी पड़ रही है महंगी, मशीनों से बनी चप्पलें खरीद रहे लोग - वेलवेट, रेशम, कशीदाकारी सब महंगा होने जूती बनाने वालों को घाटा - अब प्रतिदिन 1000 की बजाय 500 ही बिक रही जूतियां

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महंगाई के कारण पैरों में काटने लगी रजवाड़ी जूती

महंगाई के कारण पैरों में काटने लगी रजवाड़ी जूती

गजेंद्र सिंह दहिया

जालोर. विश्व प्रसिद्ध भीनमाल की जूती अब संकट के दौर से गुजर रही है। मशीनों से बने जूते और चप्पलें जूतियों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। पिछले कुछ समय से जूती का कारोबार आधा रह गया है। भीनमाल में पहले जहां प्रतिदिन एक हजार जूतियां तैयार करके स्थानीय, बड़े शहरों और विदेशों में निर्यात की जाती थी जिसकी संख्या घटकर अब आधी रह गया है। महंगाई की मार ने भी जूतियों को काॅम्पीटिशन से आउट कर दिया है। खुद जूती बनाने वाले कारीगरों के परिवारजन भी फैशन के चक्कर व सस्ती के चक्कर में चप्पलें पहन रहे हैं।

राजस्थान में भीनमाल, जोधपुर और नागौर की जूतियां प्रसिद्ध है। सर्वाधिक अच्छी जूती भीनमाल की मानी जाती है। भीनमाल के कारीगर बड़गांव कट, मोजड़ी सहित विभिन्न तरह की एक दर्जन से अधिक जूती तैयार करते हैं। वैवाहिक जूती और लेडिज जूती अलग से है। एक सामान्य जूती की कीमत भी 500 से 600 रुपए है जबकि एक जोड़ी अच्छी चप्पल भी बाजार में 200 से 250 रुपए में उपलब्ध हो जाती है। मशीनों से बनने के कारण चप्पलें सस्ती पड़ती है, जबकि जूतियों को हाथ से बनाना पड़ता है।

1200 घर और 2500 कारीगर

भीनमाल में जूती बनाने वाले करीब 1200 परिवार है और प्रत्येक परिवार में कम से कम दो सदस्य जूती तैयार करते हैं। कूुल मिलाकर 2500 लोग सीधे तौर पर जूती के व्यवसाय से जुड़े हैं लेकिन बीते कुछ समय जूती बनाने का कच्चा माल महंगा होने से अब जूती कारोबार की कमर टूटने लगी है।

जूती पर महंगाई की मार

कच्चा माल ------ कोरोना से पहले दाम- कोरोना के बाद दाम

रेशम ------------ 300 रुपए ------------ 650 रुपए

वेलवेट----------- 100 रुपए ------------ 220 रुपए

सूती धागा ------ 70 रुपए ------------ 200 रुपए

कशीदाकारी ---- 30 रुपए ------------ 90 रुपए

सिलाई ---------- 50 रुपए------------ 100 रुपए

जूती का कच्चा माल महंगा होने, मशीनों से बने जूते-चप्पल सस्ते पड़ने और मजदूरी महंगी होने से जूती का व्यवसाय प्रभावित हुआ है। अब निर्यात भी लगभग बंद हो गया है। निर्यातक एक ही कारीगर से बनी 5 से 6 हजार जूतियों की एक साथ मांग करते हैं जो संभव नहीं है।

- महेंद्र जीनगर, जूती व्यवसायी व पूर्व पार्षद, भीनमाल